ओम नीरव

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

नवीनता के कलेवर में शिल्पबद्ध गीतिका का संकलन--'गीतिकालोक'

मिलन चौरसिया ‘मिलन’ 
गीतिकालोक:-

            परम आदरणीय श्री ओम नीरव जी द्वारा सृजित एवं सम्पादित पुस्तक गीतिकालोक इस समय मेरे हाथों में है।इसके प्रथम अर्द्धांश में गीतिका विधा के बारे में सम्यक जानकारी दी गयी है।इस पुस्तक को पढ़कर अबतक मैं जो समझ सका वो ये कि परम सनेही, सरल हृदय श्री ओम नीरव जी द्वारा नवीन विधा गीतिका का सृजन ग़ज़ल को आधार बनाकर किया गया है।
              गीतिका में ग़ज़ल के शब्दों यथा मिसरे को पद,शेर को युग्म,उला मिसरे को पूर्व पद,सानी मिसरे को पूरक पद,मतला को मुखड़ा,मक्ता को मनका और हुस्ने मतला को रूप मुखड़ा नाम दिया गया है।हुस्ने मतला से एक रोचक संस्मरण याद आया, कवितालोक की एक पोस्ट पर किसी ने कमेन्ट में पूछा कि मुख्य मुखड़े के अलावा यदि कोई और मुखड़ा होता है तो उसे क्या कहा जाएगा? प्रत्युत्तर में मैंने लिखा था, " सह मुखड़ा"। तब तक रुप मुखड़ा नाम न मिला था या मैं ही अनभिज्ञ था। खैर आगे- ग़ज़ल के सारे ऐब/ दोष गीतिका में भी हैं।हाँ ग़ज़ल के एक गुण अलिफ़वस्ल / अकारयोग को गीतिका में दोष/ ऐब माना गया है जो इसे ग़ज़ल से अलग करता है।
            गीतिका का सारा ताना बाना हिन्दी शब्दों, छन्दों, अलंकारो और व्याकरण से बुना गया है।
गीतिका नवीनता के कलेवर में शिल्पबद्धता के साथ परम्परागत विधाओं को सहेजते हुए आगे निकल पड़ी है।
           इसमें मात्राभार,तुकान्त विधान,छन्द विधान,आधार छन्द,मापनीयुक्त,मापनीमुक्त,वर्णिक मापनी,वाचिक मापनी,मात्रिक मापनी आदि से सुसज्जित है।
            जहाँ ग़ज़ल में मात्रापतन इंगित न होने से कई बार बह्र निर्धारण के साथ लय निर्धारण कठिन व जटिल हो जाता है वहीं गीतिका में मात्रापतन इंगित होने से मापनी व लय निर्धारण सुगम हो जाता है।
इस प्रकार हम पाते हैं कि गीतिका; ग़ज़ल से इतर स्वरूप में ग़ज़ल के समकक्ष खड़ी नजर आती है।
              प्रस्तुत पुस्तक गीतिकालोक के दूसरे अर्द्धांश में देशभर के विभिन्न रचनाकारों द्वारा सृजित उत्कृष्ट गीतिकाएँ संकलित हैं जो नये सीखने वालों के लिए जहाँ मील का पत्थर साबित होंगी वहीं शेष के लिए आनन्द का अविरल स्रोत।पुस्तक में मुझ अकिंचन की भी दो गीतिकाओं को स्थान मिला है। इस पुस्तक से जुड़कर मैं स्वयं को गौरान्वित महसूस कर रहा हूँ।
             गीतिकालोक का लोकार्पण सुल्तानों की धरती सुल्तानपुर में ७अप्रैल २०१६ को रामनरेश त्रिपाठी सभागार में किया गया , जहाँ परम सनेही ,सहृदय श्री ओम नीरव जी से रूबरू मिलने का परमसुख प्राप्त हुआ वहीं सृजन के कई सुल्तानो से भी मिलने का सुअवसर रहा ,जिसमें विशेष रूप से भाई अवनीश त्रिपाठी जी, सौरभ पाण्डेयजी, श्याम फत्तनपुरी जी, डॉ.कैलाश मिश्र जी, मनोज मानव जी,समीर परिमल जी, कालीचरण सिंह राजपूत जी,नागाइच रोशन जी, गोप कुमार मिश्र जी,प्रमिला आर्य जी,रामनरेश यादव जी,कन्हैया लखीमपुर खीरी जी,उमाकान्त पाण्डेय जी,शिवनारायण यादव जी,हेमन्त कुमार कीर्ण जी,धीरज श्रीवास्तव जी आदि। धीरज श्रीवास्तव जी का उल्लेख विशेष रूप से समीचीन है क्योंकि इसीदिन "मेरे गाँव की चिनमुनकी" ,(मनोहारी गीतों का संकलन) पुस्तक का भी लोकार्पण किया गया जो भाई धीरज श्रीवास्तव जी द्वारा सृजित है।
         मेरा परम सौभाग्य कि मैं इन पुस्तकों गीतिकालोक व मेरे गाँव की चिनमुनकी के लोकार्पण का साक्षी रहा। हिन्दी रचनाकारों को इस पुस्तक गीतिकालोक से जहाँ विभिन्न छन्दों व गितिका विधा के सृजन में संपूर्णता प्राप्त होगी वहीं ग़ज़ल की रचना में भी समान उपयोगी है। इस प्रकार यह पुस्तक सभी के लिए संग्रहणीय ही नहीं अपितु हिन्दी साहित्य की अनमोल धरोहर है।।
पुस्तक के साथ सभी मित्रों को समर्पित शेर-

सुकून उनको मिले दिल को मेरे चैन मिले।
ख़ुदा करे कि हो ऐसा जब उनसे नैन मिले।।

------मिलन चौरसिया मिलन
         मऊ, उत्तर प्रदेश