मंगलवार, 17 जनवरी 2017

महोना में कवितालोक सृजन संस्थान लखनऊ की काव्यशाला का सफल आयोजन

       कवितालोक सृजन संस्थान के तत्वावधान में एक काव्यशाला का आयोजन महोना के चन्द्र वाटिका शिक्षा निकेतन में व्यवस्थापक डॉ० सी.के. मिश्र जी के सौजन्य से किया गया। आयोजन की अध्यक्षता नरेंद्र भूषण जी ने की तथा संयोजन और संचालन युवा कवि राहुल द्विवेदी स्मित ने किया। मुख्य अतिथि के रूप में डॉ अजय प्रसून जी और विशिष्ट अतिथि के रूप में श्री केदार नाथ शुक्ल जी व श्री श्याम फतनपुरी जी उपस्थित रहे। 

         काव्यशाला का प्रारम्भ मंजुल मंज़र लखनवी जी की सुमधुर वाणी वंदना से हुआ । इस अवसर पर अनेक कवियों ने छंद, मुक्तक, गीत, गीतिका, ग़ज़ल, व्यंग्य आदि के द्वारा श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर लिया । कार्यक्रम का महत्व तब और बढ़ गया जब विद्यालय के बच्चों ने अपनी जिज्ञासु प्रवृत्ति के आधार पर मंचासीन अतिथि व विशेषज्ञों से साहित्य व कविता के सन्दर्भ में अपने प्रश्न पूछे और उनका संतुष्टि पूर्ण उत्तर प्राप्त किया । प्रश्न पूछने वाले बच्चों में सूरज कुमार (कक्षा-१०), आकृति मौर्या (कक्षा-९), बुशरा फातिमा (कक्षा-९) आदि प्रमुख रहे ।
           कार्यक्रम में कवितालोक सृजन संस्थान के संरक्षक ओम नीरव जी ने 'विश्व विधायक' साप्ताहिक समाचार पत्र के सम्पादक व कवि श्री मृत्युंजय प्रसाद गुप्त जी को 'कविता लोक रत्न' सारस्वत सम्मान से सम्मानित किया ।
          इस अवसर पर अध्यक्षीय काव्यपाठ करते हुए नरेंद्र भूषण जी ने:----
' है अधिक ऊँचा नहीं ये आसमाँ,
सिर जरा ऊँचा उठाकर देखिये ।
आईने में खुद दिखेंगे अजनबी,
आप यदि आँखें मिलाकर देखिये ।।'
सुनाकर कार्यक्रम को उत्कृष्टता प्रदान की ।
         कविता लोक के संरक्षक ओम नीरव जी ने:---
'ओ शमा, छंद हूँ मैं पतंगा नहीं,
ख्याति की ज्योति में मैं जलूँगा नहीं ।'
पंक्तियों में एक सच्चे कवि के हृदय की भावनाओं को स्वर दिए ।
         कार्यक्रम के मुख्य अतिथि व देश के प्रसिद्ध गीतकार डॉ. अजय प्रसून जी ने:---
'एक बून्द तो क्या ये,
मरु का सागर पचा रही है ।
मृगतृष्णा हमको दलदल में,
कब से नचा रही है ।'
सुनाकर श्रोताओं को झूमने पर विवश कर दिया ।
           सीतापुर से पधारे व मंचों के सशक्त हस्ताक्षर केदार नाथ शुक्ल जी ने:-----
'गांधी के तन पर भले अभी
दिखलाती एक लँगोटी है ।
पर उनके चेलों ने तिकड़म
से रकम पीट ली मोटी है । '
जैसी पंक्तियों से वर्तमान भ्रष्ट व्यवस्था पर जोरदार तमाचा जड़ा और जनमानस को सोंचने पर विवश किया ।
       श्याम फतनपुरी जी ने:---
'सारे तीरथ आ जाते हैं,
उन चरणों की सेवा में ।
माई- बाबू की सेवा में
चारो धाम हमारा हो ।'
सुनाकर सभी को भारतीय संस्कृति में संस्कारों की महत्ता का स्मरण करा दिया ।
       उमाकान्त पांडे जी ने:----
''हमारे देश की सरहद को
दुश्मन छू नहीं सकता,
तिरंगा हाथ में है दिल में
हिंदुस्तान जिन्दा है ।''
सुनाकर देश के हर नागरिक के देश के प्रति उद्गारों को आवाज दी ।
       शशि सौरभ जी ने दोहा छंद में:---
'बैल खड़े हैं खेत में, रोता रहा किसान । हरियाली को काट के पछताए इंसान ।।'
दोहा पढ़कर तालियां बटोरीं ।
        मुकेश कुमार मिश्र ने:/----
' जो चाहते हो राम राज लाना उठो
आज ही राम का रूप धारो ।'
पढ़कर आज के सामजिक परिवेश में एक महत्वपूर्ण आवश्यकता को स्वर दिया ।
       परमहंस मिश्र 'प्रचंड' जी ने
'अभी भंग कितनी घुलेगी,
पूछती टूटकर चूड़ियाँ ।'
पंक्तियाँ पढ़कर खूब तालियाँ बटोरीं ।
       मन्जुल मन्ज़र लखनवी जी ने
'चाह मरती ही नहीं जिस्म ये मर जायेगा ।
प्राण खुशबू है हवाओ में बिखर जायेगा ।'
गीतिका को अपनी जादुई आवाज में सुनाकर शमा बाँध दिया और भरपूर तालियां बटोरीं ।
         गौरव पांडे रूद्र ने
'साये मायूसी चारों तरफ ही,
आस का दीपक जलाओ तुम जरा ।'
सुनाकर खूब वाहवाही प्राप्त की ।
         आलमबाग से पधारे मनमोहन सिंह भाटिया 'दर्द लखनवी' जी ने '
इक नज़र देख लो हम सँवर जायेंगे,
बिगड़े हालात सारे सुधर जायेंगे ।'
ग़ज़ल पढ़ी तो श्रोता झूम उठे और वाह वाह और तालियों से सदन गूँज उठा ।
         विश्व विधायक साप्ताहिक समाचार पत्र के सम्पादक मृत्युंजय प्रसाद गुप्त जी ने
'अपनी सेवा है प्रकाश
करना जग सद्गुण फैले,
रंच मात्र भी रहे न रीता
समय जो अवगुण परखे ।'
पंक्तियों के माध्यम से जन मन को जाग्रत करने का प्रयास किया ।
       डॉ. शर्मेश शर्मा जी ने '
सदा सौहार्द की संवेदनाएं लेके चलते हैं ।
प्रफुल्लित हों सभी ऐसी फिजायें लेके चलते हैं ।'
जैसी उत्कृष्ट मंचीय व साहित्यिक रचनाओं के माध्यम से श्रोताओं को भरपूर रसपान कराया ।
       राजेंद्र द्विवेदी जी ने
'इकरार पा गया हूँ इंकार करते-करते ।
मैं मैं नहीं रहा हूँ दीदार करते करते ।'
रचना सुनाई ।
        लखनऊ के जाने माने हास्य कवि चेतराम अज्ञानी जी ने '
आपन चाहति हौ गान अगर,
करौ सिखव सम्मान ।
दुस्मनहु का द्वार पर,
करौ न तुम अपमान ।'
जैसी व्यंगात्मक व प्रेरणाप्रद रचनाएँ सुनाकर श्रोताओं को ठहाके लगाने व चिंतन करने हेतु विवश कर दिया ।
      आभा चंद्रा जी ने '
ये जो दुनिया है दायिमी कम है,
गम बहोत है ख़ुशी कम है ।'
सुनाकर जीवन का दार्शनिक स्वरूप प्रस्तुत किया ।
      भैरोनाथ पांडेय ने
' छेड़कर कल्पनाओं में तुमको,
मन ही मन खुश हो रहे हैं ।'
जैसी श्रृंगार रस से सराबोर रचनाएँ सुनकर खूब तालियां बटोरीं ।
       विपिन मलीहाबादी जी ने
'वे प्यार देखो कर रहे हैं गुठली मार के,
कैसे वफ़ा निभा रहे हैं गुठली मार के ।'
अपने ही अनोखे अंदाज में सुनाकर सभी को अपना मुरीद बना लिया ।
       नीरज द्विवेदी ने '
गलत पिता को ही करे, साबित पुत्र महान ।
मन मसोसता है पिता, दोष स्वयं का मान ।।'
दोहे के माध्यम से आज की पीढ़ी पर जमकर तीखे व्यंग किये ।
      सुरेखा अग्रवाल जी ने '
कितनी लफ्जों में सिमटती ये औरतें....
आबो हवा का असर यूँ हुआ .....'
जैसी पंक्तियों से न सिर्फ राजनीति पर जमकर प्रहार किए साथ ही आज की नारी की व्यथा को भी सबके सामने रखा और खूब सराहना बटोरी ।
      महेश अष्ठाना जी ने
'राजनीति ने बेड़ा गर्त कर दिया यारों,
बाप बाप न रहा बेटा बाप हुआ यारों ।'
पंक्तियों के माध्यम से वर्तमान उत्तर प्रदेश की राजनीति पर तीखे व्यंग किये और सराहना प्राप्त की ।
     सीमा मधुरिमा जी ने
' तुमने पूछा मैं कौन हूँ...
तो सुनो मैं हूँ तथाकथित नारी शक्ति...'
जैसी पंक्तियों से इस पुरुष प्रधान समाज को मुंहतोड़ जवाब देते हुए उन्हें सोंचने पर विवश कर दिया ।
          आज कवि योगेश चौहान ने
'वीर गति से पूर्व कहा होगा दुश्मन को भून दिया,
पत्नी को सिंदूर दिया माता को हमने खून दिया ।'
पंक्तियों में ओजपूर्ण काव्य पाठ प्रस्तुत किया ।
         प्रतापगढ़ से आये आशुतोष 'आशु' जी ने
'खेत खलिहान हो या ढाबा व दुकान कोई,
करने में काम तन काला फिर हो गया ।'
सुनाकर कर्म का सन्देश देते हुए खून तालियाँ बटोरीं ।
        कार्यक्रम के संयोजक व संचालक राहुल द्विवेदी 'स्मित' ने '
जिन आँखों में बंजर दुनिया,
उनकी खातिर पत्थर दुनिया ।'
पंक्तियों को प्रवाह देते हुए गीत के माध्यम से मानवीय सम्वेदनाओं का दार्शनिक स्वरूप प्रस्तुत किया ।
अंत में कविता लोक व काव्यशाला के संरक्षक ओम नीरव जी ने सभी रचनाकारों द्वारा प्रस्तुत रचनाओं की छंद व काव्य के तत्वों के आधार पर संक्षिप्त समीक्षा की व छंद व काव्य की बारीकियों से सभी को अवगत कराया ।

कवितालोक

दिनांक:--- 17/01/2017

रविवार, 1 जनवरी 2017

कवितालोक सृजन संस्थान लखनऊ के षष्ठम गीतिका समारोह का आयोजन

संध्या जी को गीतिका रत्न व निवेदिता जी को कवितालोक रत्न
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कवितालोक सृजन संस्थान के छठे गीतिका समारोह का आयोजन ओम कुटीर
पर प्रख्यात नवगीतकार मधुकर अष्ठाना जी की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। ओम नीरव के संयोजन और राहुल द्विवेदी स्मित जी के संचालन में सम्पन्न इस समारोह में मुख्य अतिथि प्रख्यात गीतकार शिवभजन कमलेश जी और विशिष्ट अतिथि केदार नाथ शुक्ल जी ने मंच को गरिमा प्रदान की। इस अवसर पर हिन्दी भाषा का गौरव बढ़ाने वाली गीतिका-विधा के सृजन-संवर्धन के लिए कवयित्री संध्या सिंह जी को 'गीतिका रत्न' से और हिन्दी कविता के संवर्धन में विशिष्ट योगदान के लिए कवयित्री निवेदिता श्रीवास्तव जी को 'कवितालोक रत्न' से सम्मानित किया गया। शिवभजन  कमलेश जी की सुमधुर वाणी वंदना से प्रारम्भ हुए काव्य पाठ के क्रम में ब्रजेश नीरज जी ने सुमेरु छंद पर आधारित गीतिका के युग्मों पर श्रोताओं की भरपूर तालियाँ प्राप्त कीं -
खुशी है गाँव अपने जा रहा हूँ।
महक मिट्टी की सोंधी पा रहा हूँ।
मचानों पर जो मैंने चढ़ के देखा,
हिमालय को भी छोटा पा रहा हूँ।
संध्या सिंह जी ने मापनी गालगागा गालगागा गालगागा पर आधारित गीतिका  सुनाकर सभी को सम्मोहित कर दिया, उनकी गीतिका के मुखड़ा और युग्म -
छोड़ अपना घर सदा बाहर फिरा है।
मन भला कब देह के भीतर पला है।
तुम जिसे मंज़िल समझ कर जी रहे हो,
वह पड़ाओं का महज एक सिलसिला है।
राहुल द्विवेदी जी ने गीतिका छंद पर आधारित गीतिका में गीतिका विधा की विशिष्टता को व्यक्त कर श्रोताओं को मुग्ध कर लिया -
पुष्प सुरभित सुगंधित विधा गीतिका,
लो चली हो व्यवस्थित विधा गीतिका।
ओम नीरव जी ने नव वर्ष के स्वागत में लावणी छंद पर आधारित गीतिका सुनाते हुए कहा-
फसलें आज गयीं जो बोयी, वे कल को लहराएंगी।
सोलह की गदरायी कलियाँ, सत्रह में खिल जाएंगी।
घोर अभावों के घर पलकर, राजा रंक बना कोई, 
आँसू के घर-आँगन को अब, मुसकाने महकाएंगी।
इसी क्रम में मन मोहन बाराकोटी 'तमाचा लखनवी' जी ने अपनी पंक्तियों से ओज का संचार कर दिया -
निज पर सदा भरोसा रखना, अपने मन में धीर धर,
आगे बढ़ते रहो साथियों, तुम लहरों को चीर कर।
राम शंकर वर्मा जी ने गीत 'आ गए हैं ढोलकों की थाप वाले दिन' सुनाकर वाहवाही लूटी तो केदार नाथ शुक्ल जी ने सरसी छंद में ढली इन पंक्तियो पर भरपूर प्रशंसा प्राप्त की-
काशी की है सुबह सिसकती और अवध की शाम,
तम्बू नीचे खड़े विदाई देते हैं श्रीराम।
केवल प्रसाद सत्यम जी ने ग्राम्य जीवन की त्रासदी को कुछ इसप्रकार शब्दायित किया-
गावों की उस महक को, कैसे रखते साथ,
बिके बैल, वन, बाग सब, मिट्टी हुई अनाथ।
कवयित्री निवेदिता श्रीवास्तव जी ने स्वस्तिवाचन को सुंदरता से शब्दायित किय। प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा जी ने नव वर्ष की रहस्यात्मक अनुभूति को कुछ इसप्रकार शब्द दिये-
विगत आगत मध्य जीवन चक्र चल रहा,
खिले पुष्प से द्वार पर करते हम वंदन।
महेश प्रसाद अष्ठाना जी ने युग के पथिक को इन शब्दों में प्राण ऊर्जा प्रदान की-
कभी थको मत, कभी रुको मत, कभी न बैठो हार कर, 
लड़ना होगा, लड़ना होगा, तूफानों को पार कर।
शिवभजन कमलेश जी ने गीतों की सलिला प्रवाहित करने के साथ नए साल के स्वागत में प्रस्तुत मनहर घनाक्षरी छंद की इन पंक्तियों पर श्रोताओं को वाह-वाह करने को विवश कर दिया-
राम करे अन्न जल का कहीं न हो अभाव,
और कहीं भी अकाल मृत्यु का न फेरा हो।
प्रेम और ज्ञान का हो संचरण कमलेश,
नित्य नए रंग में उमंग का सवेरा हो।
अध्यक्षीय काव्य पाठ करते हुए मधुकर अष्ठाना जी उत्कृष्ट बिम्ब यूजनाओं से युक्त नव गीतों के प्रस्तुतीकरण से सभी को भाव विभोर कर दिया, उनकी इन  पंक्तियों पर श्रोता झूम उठे-
सपने ही देखते रहे हम, और उमर आ गयी किनारे,
टूट गया जब अपनों का भ्रम, रहे भंवर में बिना सहारे।
अंत में समाजसेवी शिक्षक रवि कान्त मिश्र जी ने सभी आगंतुकों का आभार व्यक्त किया।
             -:कवितालोक:-

रविवार, 4 दिसंबर 2016

कवितालोक लखनऊ द्वारा आयोजित कार्यशाला का भव्य आयोजन सम्पन्न

कवितालोक लखनऊ की आठवीं कार्यशाला का आयोजन ओम-कुटीर के सभागार में ओम नीरव के संयोजन में सम्पन्न हुआ। आयोजन के अध्यक्ष डॉ अजय प्रसून जी, मुख्य अतिथि डॉ उमेश चन्द्र श्रीवास्तव जी और विशिष्ट अतिथि आभा मिश्रा जी एवं हरि प्रसाद मिश्र ’असीम’ जी की सारस्वत उपस्थिति में कार्यशाला का सफल संचालन राहुल द्विवेदी ‘स्मित’ जी ने किया। इस अवसर पर कवितालोक-अध्यक्ष ओम नीरव ने हिन्दी साहित्य के सृजन-संवर्धन के लिए महिला उत्थान मंच की संयोजक आभा मिश्रा जी को ‘कवितालोक रत्न’ सम्मान और विपिन मलिहाबादी जी को ‘गीतिका रत्न’ सम्मान से विभूषित किया। काव्यपाठ से पहले गीतिका विधा के आधार छंदों के रूप में विधाता, लावणी, स्रग्विणी, गंगोदक, पदपादाकुलक, चौपाई, गीतिका, मुनिशेखर, हरिगीतिका आदि छंदों पर चर्चा हुई जिसमें गौरी शंकर वैश्य जी, शशि सौरभ जी, डॉ अजय प्रसून जी और राहुल द्विवेदी ‘स्मित’ की भूमिका उल्लेखनीय रही। उस बीच प्रसून जी द्वारा प्रस्तुत अनागत गीतिका की परिकल्पना का विशेष स्वागत हुआ।
आभा मिश्रा जी की सुमधुर वाणी वंदना से प्रारम्भ इस काव्य आयोजन में मानवीय मूल्यों की गिरावट को सौरभ ‘शशि’ जी ने कुछ इस प्रकार व्यक्त किया -
हाड़ मांस से अब कहाँ बनते हैं इंसान,
ममता का संसार में शेष नहीं सम्मान।
मंजुल मंज़र लखनवी जी ने तालियों की गड़गड़ाहट के बीच ये पंक्तियाँ सुनाईं -
जो सोचा नहीं था यहाँ हो रहा है,
खुदाया ये कैसा जहां हो रहा है।
ये किसने जलाए मोहब्बत के रिश्ते,
अजब सा कसैला धुआँ हो रहा है।
मनु वाजपेयी जी ने माँ की ममता को इसप्रकार अभिव्यक्ति देकर श्रोताओं की सराहना प्राप्त की -
बिना वजहों के वह जो माँ का अक्सर मुकराना था,
असल में दर्द को मुझसे छुपाने का बहाना था।
मुकेश कुमार मिश्र की पंक्तियाँ श्रोताओं के हृदय को स्पर्श कर गईं -
भ्रष्ट बढ़ते ही गए सब हो गया लाचार मैं,
भूख का मारा हुआ हूँ क्या लिखूँ शृंगार मैं।
विपिन मलिहाबादी जी कहते सुने गए -
हजारों दिवाने हुए कैसे तेरे,
बताकर हमें अपना कायल बना ले।
राहुल द्विवेदी ‘स्मित’ जी गीतिका विधा में वाणी वंदना सुनाकर श्रोताओं को मुग्ध कर लिया -
श्वेत वसना मेरे कंठ में आ बसो गीत छंदों में तुमको ही गाता रहूँ,
भक्तिमय छंद रचता रहूँ रातदिन, भाव पुष्पों से तुमको रिझाता रहूँ।
मिज़ाज लखनवी जी की इन पंक्तियों ने लोगों के दिलों पर गहरा असर किया -
क्या भरोसा कि सहर देख लूँ मैं भी कल की,
दो घड़ी के लिए ही अपना बना ले मुझको।
लघु मापनी में निबद्ध गीतिका सुनाते हुए गौरी शंकर वैश्य ‘विनम्र’ जी ने इन पंक्तियों पर भरपूर तालियाँ प्राप्त कीं -
उच्च अट्टालिका पड़ी सूनी,
कर्मशिल्पी मकान को तरसे।
डॉ उमेश श्रीवास्तव जी ओज पूर्ण रचना को बहुत वहवाही मिली, उनकी पंक्तियाँ -
धरती पुलकित हो उठे आज जन-जन का दुख हराना होगा,
इस कर्मभूमि में असुरों से फिर धर्म युद्ध करना होगा।
शरद पाण्डेय ‘शशांक’ जी ने धाराप्रवाह छंदों के साथ गीतिका भी सुनाई जिसकी इन पंक्तियों को बहुत पसंद किया गया -
तुम्हारे लिए मैं ग़ज़ल लिख रहा हूँ,
नयन हो रहे हैं सजल लिख रहा हूँ।
घनाक्षरी छंदों की छटा बिखेरते हुए अशोक शुक्ल ‘अनजान’ ने कहा -
बार बार जिसने किया है संकटों से पार,
आज आप उसका किनारा बन जाइए।
कवयित्री माधवी मिश्रा ने अपनी रचना में सम्मोहक प्रतीक विधान प्रस्तुत किया -
बहुत टिमटिमाते दिये रह लिये, मौन हो शौर्य के सब खजाने भरे,
आग से आग की बात होती रही, हम यूँ ही जल रहे रोशनी से परे।
हरि प्रसाद मिश्र ‘असीम’ जी की इन भावभरी पंक्तियों पर श्रोता वाह-वाह कर उठे -
जग जाते जब जज़्बात अच्छा लगता है,
तपन बढ़े और हो जाये बरसात अच्छा लगता है।
कवयित्री शोभा मिश्रा जी ने करुण रस प्रधान गीत सुनाकर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया -
आँसू बोलो क्या सोच के तुम इन आँखों में आ जाते हो,
प्रतिफल जो हँसते आढ़त मेरे उनमें पीड़ा भर जाते हो।
अध्यक्षीय काव्य पाठ करते हुए डॉ अजय प्रसून जी ने उत्कृष्ट गीत सुनाकर लोगों का मन मोह लिया और फिर गीतिका विधा पर गीतिका प्रस्तुत करते हुए कहा -
गीतिका कितनी सुंदर लगे,
भावनाओं भरा घर लगे।
संतुलित मापनी में सजी,
जैसे सुरखाब के पर लगे।
काव्यशाला के समापन पर अभ्यागतों का कृतज्ञताज्ञापन करते हुए संयोजक ओम नीरव जी ने घोषणा की कि प्रति माह कवितालोक द्वारा एक काव्यशाला और एक गीतिका-समारोह का आयोजन किया जाएगा जिसका स्थान और समय आयोजन से पूर्व सूचित कर दिया जायेगा।

रविवार, 27 नवंबर 2016

कवितालोक - जयपुर की द्वितीय मासिक काव्यशाला संपन्न


कवितालोक
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       जयपुर की द्वितीय-काव्यशाला का आयोजन संस्था के संस्थापक ओम नीरव जी के संरक्षण और वरिष्ठ सदस्य और चतुष्पदी समारोह के संचालक श्री लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला जी के संयोजन में गंगोत्री नगर,गोपालपुरा,जयपुर स्थित उनके निवास पर श्री आर.सी.शर्मा गोपाल जी की अध्यक्षता  में संपन्न हुआ |
   गोष्ठी में डॉ. बजरंग सोनी ने प्राकृति के प्रतीकों का प्रयोग कर सुंदर भाव बिम्ब उकेरे - “प्यार हो ही जाता है पहाड़ को फिजाओं से, पेड़ को हवाओं से' और फिर अजन्मी कन्याओं को शब्दायित करती मार्मिक रचना सुनाई जिससे कई आँखें नाम हो गईं।
     आर.सी. शर्मा गोपाल जी ने देश की समकालीन परिस्थितियों पर रचनाएँ सुनाकर श्रीताओं को मंत्रमुग्ध कर लिया, उनका प्रशंसित दोहा-
बहुत कहा संतोष रख, छोड़ों संचय भाव,
डूबीं अपने बोझ से,जिनकी भारी नाव।
       सुशील सरना जी ने राष्ट्रीय एकता हा संदेश कुछ इसप्रकार व्यंजित किया-
जमी से ज़रा राख उठाकर बताओ,
ये हिन्दू है या मुसलमान बताओ।
    सुरेश गोस्वामी 'सुरेशजी' जी ने भाव भरे दोहे सुनाकर खूब तालियाँ प्राप्त कीं -
सभी देव, तीरथ धरम, पुण्य, तपस्या दान,
मिल जाएं होता जहाँ नारी का सम्मान” |
मौन साधना है पिता, सतत करे संघर्ष,
अनुशासन पुरुषार्थ से, परिजन को दे हर्ष |
      कवयित्री शिवानी शर्मा जी ने हृदय की भाषा में रचना सुनाई तो श्रोता वाह-वाह कर उठे-
मेरी दीवानगी उनको हद से ज्यादा खलती है,
नफरतें ही नफरतें जिनके दिल में पल में पलती है।
     चन्द्र प्रकाश पारीक जी ने समाज को दर्पण दिखाते हुए सुनाया -
जीने का सामान बहुत है,
इंसान भी शैतान बहुत है।
     संयोजक लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला ने चांदों की छट बिखेरते हुए इन पंक्तियों पर श्रोताओं की सराहना प्राप्त की -
परेशान जनता को करते, षड्यंत्रों का बुनते जाल,
काले धन से भरा खजाना, आज बना जी का जंजाल।
और फिर गीतिका सुनाई तो श्रोता युग्म प्रति युग्म पर वाह-वाह करने के लिए विवश हो गए-
चौराहे पर खड़ी जिन्दगी, मुश्किल है समझाना,
निर्जन वन को दीन निहारें, खाली हुआ खजाना |
हो जाती जब शाम जिन्दगी, दूर तभी तब अपने,
कठिन डगर सी लगें जिन्दगी, मुश्किल वक्त बिताना।
रतन राठौड़ जी ने भावभरी रचना सुनाकर श्रोताओं का हृदय जीत लिया-
बन्द आँखों से रिझाना आ गया, लो हमें अब मुस्कुराना आ गया।
इनके अतिरिक्त आलोक चतुर्वेदी जी सहित सभी कवियों के सरस काव्य पाठ के साथ काव्यशाला में कोई चार घंटे तक गीत गीतिका, छंद, मुक्तक आदि का रसास्वादन होता रहा।       
            इसी बीच कवितालोक के संस्थापक श्रद्धेय ओम नीरव जी ने लखनऊ से लड़ीवाला जी के मोबाइल पर सभी आगंतुक कवियों को अपना शुभ कामना सन्देश दिया और खेद व्यक्त करते हुए बताया कि उनकी भाभी का निधन को जाने के कारण वे नहीं पहुँच सके। सभी ने उनकी भाभी के आकस्मिक निधन पर दुख जताते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। इस अवसर पर आर.सी. शर्मा गोपाल जी, अलोक चतुर्वेदी जी और रतन राठोड जी को लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला के प्रथम काव्य संग्रह "करते शब्द प्रहार" की प्रतियाँ भेंट की गईं। अंत में संयोजक लड़ीवाला जी ने गोष्ठी को सफल बनाने के लिए उपस्थित सभी साहित्यकारों का आभार व्यक्त किया और कवितालोक कार्यशाला के भावी आयोजनों को अधिकाधिक उपस्थिति से सफल बनाने का आह्वान किया।

प्रस्तुति :---
लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला

शनिवार, 26 नवंबर 2016

पीरनगर (सीतापुर) में कवितालोक विराट कविसम्मेलन


     'कवितालोक सृजन संस्थान' के तत्वावधान में एक 'विराट कवि सम्मेलन' का आयोजन 24 नवम्बर 2016 गुरुवार को पीरनगर, सीतापुर में 'श्री साठिका देवी मंदिर यज्ञ संचालक समिति' के सौजन्य से ओम नीरव के संरक्षण एवं सुनील त्रिपाठी के संयोजन में किया गया। आयोजन की अध्यक्षता ओम नीरव ने की और संचालन जाने माने मंच संचालक आशुकवि कमलेश मौर्य मृदु ने किया। मुख्य अतिथि के रूप में बम्हेरा निवासी सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य रमेशचन्द्र पान्डेय और विशिष्ट अतिथि के रूप में शुभांजलि प्रकाशन कानपुर के प्रबन्धक  डाॅ. सुभाष चन्द्रा उपस्थित रहे। कार्यक्रम का प्रारम्भ सिधौली सीतापुर के युवाकवि और मंचों के प्रसिद्द कवि लवकुश दीक्षित के प्रपौत्र वंश दीक्षित की सुमधुर वाणी वंदना से हुआ। इस अवसर पर पधारे हुए कवियों को हिन्दी साहित्य के संवर्धन में अप्रतिम योगदान के लिए शाल उढ़ाकर और सम्मान पत्र देकर कवितालोक द्वारा 'काव्य रत्न' सारस्वत सम्मान से विभूषित किया गया तथा ओम नीरव को श्री साठिका देवी यग्य संचालक समिति द्वारा काव्य विभूषण सम्मान से अलंकृत किया गया ।
          इस अवसर पर कवियों ने छंद, मुक्तक, गीत, गीतिका, ग़ज़ल, व्यंग्य आदि के द्वारा श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर लिया । रात्रि की तीसरे पहर तक अनवरत चलने वाले इस कार्यक्रम में काव्यपाठ करते हुए:------
       मनकापुर, गोंडा से पधारे गीतों के युवराज धीरज श्रीवास्तव ने भावभरी उत्कृष्ट रचनाएँ सुनाकर श्रोताओं का मन मुग्ध कर लिया। उनकी पंक्तियाँ -
' साँझ जब आँसू बहाये, बैठ दिल के द्वार पर ।
क्या भरोसा भोर का फिर, क्या तुम्हारे प्यार पर ।।'
        पीलीभीत से पधारे गीतकार संजीव मिश्र ने भारत की बेटियों पर रचना सुनाकर श्रोताकर को भावविभोर कर दिया -
धूप हो या छाँव हो पर मुस्कराती बेटियाँ,
आंधीयों में भी चरागों को जलाती बेटियाँ।
         सिधौली से पधारे वंश दीक्षित ने राष्ट्रीय गीत सुनाकर श्रोताओं में राष्ट्रीय भावना का संचार किया-
तिरंगे तेरा रूप महान।
तीन रंग में रंगा हुआ है पूरा हिंदुस्तान।
           नोटों की तत्कालीन समस्या पर लखीमपुर से आए अवधी कवि ज्ञान प्रकाश आकुल  की रचना का श्रीताओं ने जोरदार तालियों से स्वागत किया-
का सारा धन बाहर आई बड़कई तिजोरी ग्वाटन का,
सब भड़भड़ु मचिएगा न्वाटन का। 
      बाराबंकी से आये डॉ. सर्मेश शर्मा ने अपनी रचनाओं से भरपूर तालियाँ बटोरीं-
'सदा सौहार्द की सम्वेदनाएँ लेके चलते हैं ,
प्रफुल्लित हों सभी ऐसी फिजायें लेके चलते हैं ।' 
        लखनऊ से पधारे आशुकवि कमलेश मौर्य 'मृदु' ने हिंदी छंदों का मान बढ़ाती इन पंक्तियों को पढ़कर सभी को अपना प्रशंसक बना लिया-
'सत्तर वर्ष नागपंचमी मनाते बीते,
अब नागयज्ञ पर विमर्श होना चाहिए ।
पाक बांग्ला ढाका इस्लामाबाद तक
अखण्ड भारत वर्ष होना चाहिए ।।'
      सुलतानपुर से पधारे अवनीश त्रिपाठी की गीतिका पर श्रोता झूम उठे, उनकी गीतिका का युग्म -
'धुंध की चादर लपेटे धूप अलसाई हुई,
बात लेकिन हो रही है ताप के विस्तार की ।'
       लखनऊ से आये उमाकान्त पांडेय ने राष्ट्रीय भावना की रचना पढ़कर श्रोताओं की प्रशंसा प्राप्त की -
'रक्त की प्रत्येक बूँद तुमको चढ़ायें तो भी,
रहेंगे तुम्हारे कर्जदार वन्देमातरम ।
अन्न जल जिसने छुआ है माँ भारती का,
उसे कहना पड़ेगा बार-बार वन्देमातरम ।।'
     संयोजक सुनील त्रिपाठी की ओजपूर्ण प्रस्तुति सुनकर श्रोता रोमांचित हो उठे-
'याचना अब नहीं सिर्फ रण चाहिये ,
घात-प्रतिघात प्रत्याक्रमण चाहिये ।'
         लखनऊ के राहुल द्विवेदी 'स्मित' की इन पंक्तियों पर भरपूर तालियाँ मिलीं-
'तिनका तिनका बिखर रहा है यह प्यारा संसार ।
जाने किसने बना दिया है रिश्तों की ब्यापार ।।'
          पीलीभीत से पधारे संजीव मिश्र के गीत की पंक्तियाँ सभी की आँखों को पसीज गयीं -
'गुमसुम बच्चों के सँग बैठी लेकर पूजा की थाली ।
दीप जलाऊँ फिर भी तुम बिन लगती सूनी दीवाली ।।'
      लखनऊ के हरीश लोहुमी ने प्रभावशाली शब्दों में सुनाया -
'बात टाली गयी दिवाली में, रात खाली गयी दिवाली में ।
कुछ वजह थी तभी तो थोड़ी सी, फिर मँगा ली गयी दिवाली में ।'
       लखनऊ से पधारे ग़ज़लकार मंजुल मंजर लखनवी ने सम्पूर्ण जन मानस का आह्वान करते हुए कहा -
'हमारी आने वाली पीढ़ियों को गर बचाना है ,
तो आओ रोक लें मिलकर ये जहरीली हवाएँ हम ।'
          सीतापुर से आये केदार नाथ शुक्ला ने देश के जवानों का गौरव गान करती हुई रचनाएँ सुनाकर श्रोताओं का हृदय जीत लिया, उनकी पंक्तियाँ -
'सेज सुमनों की सजाकर खार पर सोती जवानी है ।
मध्य रणक्षेत्र में असिधार पर सोती जवानी है ।।'
        लखनऊ से आये ग़ज़लकार मिज़ाज़ लखनवी ने रूहानी शायराना कलाम पेश किया तो श्रोता उसी में डूबते चले गए -
'पागल था मैं भी चल पड़ा बाजार की तरफ,
पिछली सदी के हाथ में सिक्के लिए हुए ।'
       बाराबंकी से पधारे संदीप अनुरागी ने नोट बंदी पर समसामयिक रचना सुनाकर खूब तालियाँ बटोरीं -
'एकदम से लगा बैन ई पैसा के लिए है,
दादा बड़े बेचैन ई पैसा के लिए हैं ।
सत्तर बरस के बुढ़ऊ कहूँ जाति न रहैं,
उनहू लगाय लाइन ई पैसा के लिए हैं ।।'
         लखनऊ के चेतराम अज्ञानी ने व्यंग्य प्रधान अवधी रचनाएँ सुनाकर लोगों का दिल जीत लिया -
'पाकिस्ताँ मक्कार है, करति हवै अनरीत ।
सत्य क अपने देश मा, भवै हमेशा जीत ।।'
          लखनऊ से आयी कवयित्री प्रज्ञा शुक्ला ने शृंगार और अंगार दोनों को अपना विषय बनाते हुए मुक्तक और गीत सुनाकर सब का मन मोह लिया।
अध्यक्षीय काव्यपाठ करते हुए कविता लोक सृजन संस्थान के संरक्षक ओम नीरव ने अपने छंदों में व्यक्ति और समाज के यथार्थ का चित्रण कर सभी को आनन्द विभोर कर दिया और फिर राष्ट्र नायक को ये पंक्तियाँ समर्पित कीं -
'माली हो सुनो रहा करो सदा-सदा सचेत,
उग आते बाग़ में कभी-कभी बबूल भी ।
प्रेम के पथिक छाले पाँव में निहारो नहीं,
नेह से लगाओ अंक फूल और शूल भी ।।'
कार्यक्रम का समापन संयोजक सुनील त्रिपाठी के धन्यवाद-ज्ञापन से हुआ।
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