गुरुवार, 30 मार्च 2017

कवितालोक द्विशतकीय महाकुम्भ लखनऊ

कार्यक्रम दिनाँक:- 26/03/2017 समय-10.00AM
      हिंदी छन्द साहित्य के क्षेत्र में अग्रणी 'कवितालोक सृजन संस्थान' द्वारा कवितालोक द्विशतकीय सारस्वत महाकुम्भ का आयोजन संस्था के संरक्षक आचार्य 'ओम नीरव' के  संरक्षण में सभागार डिप्लोमा इंजीनीर्स संघ, है, हजरतगंज, लखनऊ में किया गया ।
जिसमें देश के कोने कोने से 100 साहित्यकार एवं कवि सम्मिलित हुए। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में साहित्यमर्मज्ञ डॉ. अनिल मिश्र जी उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. डॉ. उषा सिन्हा जी, पूर्व विभागाध्यक्ष भाषा विज्ञान विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय ने की और संयोजन सम्मिलित रूप से सुनील त्रिपाठी जी, मनोज मानव जी, उमाकान्त पाण्डेयजी, अवनीश त्रिपाठी और गीतों के राजकुमार आद धीरज श्रीवास्तव जी ने किया ।
   प्रथम सत्र में हिंदी साहित्य की विशिष्ट काव्य कृति साझा कुण्डलिनी संकलन ''कुण्डलिनी लोक'' का लोकार्पण डॉ. उषा सिन्हा जी, डॉ. अनिल मिश्र जी, डॉ. साधना जोशी प्रधान जी, डॉ मँजू श्रीवास्तव जी , डॉ. छाया शुक्ला जी,डॉ.राजेश कुमारी जी, डॉ पंकज भारद्वाज जी, सत्यदेव द्विवेदी 'पथिक' जी, शिवभजन कमलेश जी, छंदाचार्य रामदेव लाल 'विभोर' जी, नवगीतकार मधुकर अस्थाना जी एवं आचार्य ओम नीरव जी के कर कमलों द्वारा संपन्न हुआ। इसके पश्चात मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि और कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रही डॉ. उषा सिन्हा और दूर दूर से आये हुए सभी साहित्यकारों को संस्थापक आद. ओम नीरव जी ने अंगवस्त्र, सम्मान पत्र, एवं 'कुण्डलिनी लोक' की प्रति प्रदान कर सम्मानित किया।लोकार्पित 'कुण्डलिनी लोक' संकलन पर विभिन्न समीक्षकों द्वारा वक्तव्य दिया गया।
          द्वितीय सत्र में अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें लगभग 80 से अधिक कवियों ने काव्यपाठ कर काव्य की रसधार से श्रोताओं को सराबोर कर दिया।हास्य व्यंग के राष्ट्रीय कवि 'यश भारती' पुरस्कार से सम्मानित श्री सर्वेश अस्थाना जी ने अपनी विधा से हटकर एक गीत प्रस्तुत किया 'तुमने पत्र जलाया होगा'।
ओज कवि उमाकान्त पांडेय जी ने पढ़ा-
'अन्न जल जिसने छुआ है भारती का उसे,
कहना पड़ेगा बार बार वंदेमातरम।'
दिनेश कुशभुवनपुरी जी की इन पंक्तियों पर खूब तालियाँ बजीं-
'समय आ गया आगे बढ़कर,
काम करें हम सब अब मिलकर
कर्म योग मोदी सँग करके
योगी बनने का अवसर है ।'
कार्यक्रम के संयोजक सुनील त्रिपाठी जी ने आद नीरव जी के सम्मान में ये पंक्तियाँ पढ़ीं
'मनाया द्विशतकीय कुम्भ है इस बार नीरव जी,
जुटा सम्पूर्ण कवितालोक का परिवार नीरव जी।'
लखीमपुर से आये कन्हैया लखीमपुरी ने-
'पप्पू को सौ भारी लगते अम्मा की दवाई पर,
पूरी जेब लुटा दी मुन्नी बाई की अँगड़ाई पर।'
गीतों के राजकुमार 'धीरज श्रीवास्तव' जी ने सुनाया
'साँझ जब आँसू बहाये बैठ दिल के इस पार पर,
क्या भरोसा भोर का फिर क्या तुम्हारे प्यार पर।'
हिंदी संस्थान के पुरस्कृत कवि'कुमार तरल' जी ने सुनाया
'आन बान शान पे किये जो कुर्बानी जान,
ध्यान में शहीदों की शहादत बनी रहे।'
बाराबंकी से आये डॉ. शर्मेश शर्मा ने पढ़ा-
'जमाना लाख हो दुश्मन हमारा कुछ न बिगड़ेगा, मैं अपने बाप- माँ- गुरु की दुआएँ ले के चलता हूँ।'
बिजनौर से आये गीतिकाकार मनोज मानव जी ने पढ़ा -
'खुल कर सत्य बयानी लिख दे,
कुछ भी लिख तूफानी लिख दे।'
जयपुर से पधारी ' डॉ.साधना प्रधान जी ने सुनाया-
'हार जाए संकटों से वह मनुज होता नहीं,
है वही मानव खरा जोधैर्य को खोता नहीं।'
मंजुल मंज़र लखनवी की पंक्तियाँ थी -
'चलो इस भारती माँ के सपूतों को नमन कर लें,
लुटा दें जान वतन पर ऐसे लोगों को नमन कर लें'
सौरभ टण्डन'शशि' के बसन्त गीत-
'गीत  में  उद्गार  झलके राग में  ढलने  लगे
रुत बसन्ती आ गयी है सुर नये सजने लगे ।।'
पर सारे श्रोतागण झूम उठे.
मऊ से मिलन चौरसिया'मिलन' जी अपनी ग़ज़ल-'केशव मुस्काये तो मैं क्या करूँ' सुनाकर सभी का मन जीत लिया
अन्त में आचार्य 'ओम नीरव' जी ने आये हुए सम्मानित कवियों का आभार व्यक्त किया और अपने काव्य पाठ में यह छन्द पढ़े-
'माटी का हो घट या हो स्वर्ण का कलश भव्य,
मदिरा के पात्र से दुर्गन्ध ही तो आयेगी।
शब्द के तलाव में डुबाओ जितना भी चाहे
झूठ की किताब शव तुल्य उतरायेगी।
अनुबंध चुनरी के प्रेम तार टांकने में
द्वेष ग्रंथि आयी तो बुनाई उलझायेगी
द्वेष की दीवार हो विशाल चाहे जितनी भी,
प्रेम के आकाश से तो नीची रह जायेगी ।।'
'नीरव जी' की इन पंक्तियों को श्रोताओं द्वारा खूब सराहा गया ।।

सम्मानित कवि एवं साहित्य प्रेमी तथा उन्हें प्राप्त सम्मान:-------

द्विशतकीय महाकुंभ सूची (सम्मानों के क्रम में ) 
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1 तिलक जैन (कुण्डलिनी रत्न) संरक्षक, काव्य गूँज, हिसार, हरियाणा 
2 मनोज मानव (कुण्डलिनी रत्न) सहसंचालक, कवितालोक सृजन संस्थान, लखनऊ
3 अवनीश त्रिपाठी (कुण्डलिनी रत्न) संस्थापक अध्यक्ष, पं. रामानुज त्रिपाठी सृजन संस्थान, गरयें,सुल्तानपुर, उ.प्र.
4 धीरज श्रीवास्तव (कुण्डलिनी रत्न) >संस्थापक सचिव, साहित्य प्रोत्साहन संस्थान, मनकापुर, गोंडा
5 सूक्ष्म लता महाजन (कुण्डलिनी रत्न) >कार्यकारिणी सदस्य, दिल्ली पोइट्री सर्कल, दिल्ली
6  डॉ. मंजु श्रीवास्तव (कुण्डलिनी रत्न) >सदस्य, साहित्यिक संस्था ‘तरंग’, कानपुर
7 डॉ बिपिन पाण्डेय (कुण्डलिनी रत्न)
सीतापुर, उत्तर प्रदेश
8 प्रमोद तिवारी ‘हंस’ (कुण्डलिनी रत्न) भरथना, इटावा, उ.प्र. 
9 छाया शुक्ला ‘छाया’ (कुण्डलिनी रत्न) >वाराणसी, उत्तर प्रदेश
10 डॉ. साधना जोशी प्रधान (कुण्डलिनी रत्न) > परामर्शदात्री, राजस्थान लेखिका साहित्य संस्थान, जयपुर
11 अनिल कुमार पाण्डेय (कुण्डलिनी रत्न) >अध्यक्ष, साहित्य प्रोत्साहन संस्थान, मनकापुर, गोण्डा (उ.प्र)
12उमा शंकर शुक्ल ‘आलोक’ (कुण्डलिनी रत्न) > अध्यक्ष, प्रगतिशील लेखक संघ, गोण्डा (उ0प्र0 )
13 दिनेश कुशभुवनपुरी (कुण्डलिनी रत्न) >सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश
14कन्हैया लखीमपुरी (कुण्डलिनी रत्न) सेमरिया, लखीमपुर, खीरी, उत्तर प्रदेश 
15 छाया त्रिपाठी ओझा (कुण्डलिनी रत्न) >फतेहपुर, उत्तर प्रदेश
16 दीपक गोस्वामी ‘चिराग’ (कुण्डलिनी रत्न) > संस्थापक अध्यक्ष, सृजन साहित्यिक अभिरूचि मंच, बहजोई , उत्तर प्रदेश
17 प्रद्युम्न चतुर्वेदी (कुण्डलिनी रत्न) सिवनी, मध्यप्रदेश
18 पारसनाथ श्रीवास्तव (कुण्डलिनी रत्न) >संरक्षक, साहित्य प्रोत्साहन संस्थान, मनकापुर, गोण्डा (उ.प्र.)
19 ईश्वर चन्द्र मेंहदावली (कुण्डलिनी रत्न) >मेंहदावल, संतकबीर नगर, उत्तर प्रदेश 
20 मिलन चौरसिया ‘मिलन’ (कुण्डलिनी रत्न) मुहम्मदाबाद सिपाह-मऊ, उत्तर प्रदेश
21 सुनील कुमार त्रिपाठी (कुण्डलिनी रत्न) सहसंचालक, कवितालोक सृजन संस्थान, लखनऊ
22 उमा कान्त पाण्डेय (कुण्डलिनी रत्न) सहसंचालक, कवितालोक सृजन संस्थान, लखनऊ
23 हरीश चन्द्र लोहुमी (कुण्डलिनी रत्न) विकास नगर, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
24 श्याम फतनपुरी (कुण्डलिनी रत्न) गोमती नगर, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
25 कुमार तरल (कुण्डलिनी रत्न) उपाध्यक्ष, अखिल भारतीय साहित्य परिषद, लखनऊ
26 सौरभ टंडन ‘शशि’ (कुण्डलिनी रत्न) अलीगंज, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
27 मंजुल मंज़र लखनवी (कुण्डलिनी रत्न) सदस्य, संस्कार भारती, लखनऊ

काव्य रत्न सम्मान
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28हेमन्त कुमार 'कीर्ण' (काव्य रत्न) मंत्री, चंद्रप्रभा साहित्यिक मंच, चकिया, चंदौली, उत्तर प्रदेश 
29 अशोक व्यग्र (काव्य रत्न) भोपाल, मध्य प्रदेश
30 दानिश जयपुरी (काव्य रत्न) भोपाल, मध्य प्रदेश
3 राजेश्वर राय (काव्य रत्न) > संपादक, दैनिक समाचार पत्र ‘ट्रू टाइम्स’, दिल्ली 
32 शुभदा वाजपेयी (काव्य रत्न) > सदस्य, वाणी साहित्यिक संस्था, कानपुर
33 डॉ. देवनारायण शर्मा (काव्य रत्न) >रानीपुर कायस्थ, सुलतानपुर, उत्तर प्रदेश
34 शिवानन्द सिंह 'सहयोगी' (काव्य रत्न) गंगानगर, मेरठ,  उत्तर प्रदेश
35 केशर बख्श सिंह (काव्य रत्न) नरायनपुर, रायबरेली , उत्तर प्रदेश
36 विजय नारायण सिंह ‘बेरुका’(काव्य रत्न) प्रचार सचिव, साहित्यिक मंच ‘हुलास’, जमशेदपुर, उत्तर प्रदेश
37 डॉ प्रदीप कुमार चित्रांशी (काव्य रत्न) >अध्यक्ष, साहित्यांजलि प्रज्योदि सामाजिक साहित्यिक एवं सास्कृतिक संस्था, इलाहाबाद
38अनुपम आलोक (काव्य रत्न) बाँगरमऊ, उन्नाव, उत्तर प्रदेश
39मुसाफ़िर व्यास (काव्य रत्न) खातेगांव , भोपाल, म.प्र.
40 कुन्दन कुमार उपाध्याय (काव्य रत्न)प्रचारक, साहित्य प्रोत्साहन संस्थान, मनकापुर, गोंडा, उत्तर प्रदेश
41डॉ. अशोक गौतम (काव्य रत्न) अध्यक्ष, अखिल भारतीय शिखर साहित्य संगम, भोपाल, मध्य प्रदेश
42 सत्यवीर सिंह 'उजाला' (काव्य रत्न) > संगठन मंत्री, सृजन साहित्यिक अभिरूचि मंच, बहजोई , उत्तर प्रदेश
43 राजेश कुमारी 'राज' (काव्य रत्न) >देहरादून, उत्तराखंड
44 विद्या भूषण मिश्र ‘ज़फ़र’ (काव्य रत्न) देवरिया, उत्तर प्रदेश
45राम लखन वर्मा (काव्य रत्न) >मनकापुर, गोंडा, उत्तर प्रदेश
46राघवेंद्र चिंगारी (काव्य रत्न) कौंच, जालौन, उत्तर प्रदेश
47डॉ. कैलाश नाथ मिश्र (काव्य रत्न) >फतनपुर, प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश
48 अशोक कुमार पाण्डेय ‘अशोक’ (काव्य रत्न) अध्यक्ष, सर्वजन हिताय साहित्यिक समिति, लखनऊ
49 रामदेव लाल विभोर (काव्य रत्न) संस्थापक, काव्य कला संगम, लखनऊ
50 डॉ. अजय प्रसून (काव्य रत्न) अध्यक्ष, अखिल भारतीय अनागत साहित्य संस्थान, लखनऊ
51 सर्वेश अस्थाना, लखनऊ (काव्य रत्न) संपादक- मासिक पत्र ‘साहित्यगंधा’
52 डॉ. शिव भजन ‘कमलेश’ (काव्य रत्न) संरक्षक, प्रतिष्ठा प्रतिष्ठा साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था, आलमबाग, लखनऊ
53मधुकर अष्ठाना (काव्य रत्न) संयोजक संस्थापक, अखिल भारतीय प्रगतिशील गीतकार मंच, लखनऊ
54 कृष्णा अवस्थी (काव्य रत्न) अध्यक्ष, प्रतिष्ठा साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था, आलमबाग, लखनऊ
55डॉ. उमेश चंद्र श्रीवास्तव (काव्य रत्न) सदस्य, युवा रचनाकार मंच, लखनऊ 
56 अजय प्रधान (काव्य रत्न) सक्रिय सदस्य, साहित्य साधना संस्थान बाराबंकी, उ.प्र
57 निवेदिता श्रीवास्तव (काव्य रत्न) संस्थापक अध्यक्ष, काव्या सतत साहित्य यात्रा, लखनऊ
58 मिज़ाज लखनवी (काव्य रत्न) अध्यक्ष, आम्रपाली दर्पण, लखनऊ
59 योगेश चौहान (काव्य रत्न) महासचिव, अवध भारतीय सेवा समिति, लखनऊ
60 विपिन मलिहाबादी (काव्य रत्न) प्रांतीय अध्यक्ष, भारतीय साहित्य उत्थान समिति, लखनऊ
61डॉ. कैलाश निगम (काव्य रत्न) संस्थापक, प्रतिष्ठा साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था, आलमबाग, लखनऊ
62मुकेश कुमार मिश्र (काव्य रत्न) लखनऊ, उत्तर प्रदेश
63डॉ. सत्यदेव प्रसाद द्विवेदी ‘पथिक’ (काव्य रत्न) महामंत्री, प्रतिष्ठा साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था, आलमबाग, लखनऊ
64 सुंदर लाल ‘सुंदर’ (काव्य रत्न) सदस्य, संस्कार भारती, लखनऊ
65 राजेंद्र कुमार शुक्ल ‘राज’ (काव्य रत्न) संस्थापक संयोजक, सर्वजन हिताय साहित्यिक समिति, लखनऊ
66अशोक शुक्ल ‘अनजान’ (काव्य रत्न) कोषाध्यक्ष, प्रीति नगर साहित्यिक सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक परिषद, लखनऊ 
67 ओम प्रकाश ‘मधुर’ (काव्य रत्न) अध्यक्ष, गंगो-जमुन साहियिक संस्था, डिबाई, दिल्ली
68 प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा (काव्य रत्न) संस्थापक सचिव, विमला देवी सुघर सिंह कुशवाह फ़ाउंडेशन, लखनऊ
69मृत्युंजय प्रसाद गुप्ता (काव्य रत्न) संपादक, विश्वविधायक साप्ताहिक, लखनऊ
70 चेतराम अज्ञानी (काव्य रत्न) संस्थापक अध्यक्ष, हिन्दी साहित्यिक मंच, भौली, लखनऊ
71डॉ. शर्मेश शर्मा (काव्य रत्न) रानीगंज, बाराबंकी, उत्तर प्रदेश
72 केवल प्रसाद ‘सत्यम’ (काव्य रत्न) गोमतीनगर विस्तार, लखनऊ
73 संजय सांवरा (काव्य रत्न) जजियामऊ, बाराबंकी, उत्तर प्रदेश
74 संदीप अनुरागी (काव्य रत्न) अमावा, बाराबंकी, उत्तर प्रदेश
75 आभा मिश्रा (काव्य रत्न) अध्यक्ष, महिला उत्थान समिति, सआदत गंज, लखनऊ
76 हरि प्रसाद मिश्र ‘असीम’ (काव्य रत्न) संयोजक, महिला उत्थान मंच, लखनऊ
77 पंडित अशोक दीक्षित (काव्य रत्न) कलेक्टर गंज, फतेहपुर, उत्तर प्रदेश 
78 गौरीशंकर वैश्य ‘विनम्र’ (काव्य रत्न) विकासनगर, लखनऊ, उत्तर प्रदेश

साहित्य शिरोमणि
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79 प्रो. (डॉ) उषा सिन्हा , लखनऊ (साहित्य शिरोमणि) पूर्व अध्यक्ष, भाषाविज्ञान विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय
80 डॉ अनिल मिश्र, लखनऊ (साहित्य शिरोमणि) सम्पादन समिति, नव परिमल 

साहित्य सुधाकर
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81 डा. पंकज भारद्वाज (साहित्य सुधाकर) > संपादक, पब्लिक इमोशन सांध्य दैनिक, बिजनौर, उत्तर प्रदेश
82 रवीन्द्र कुमार श्रीवास्तव (साहित्य सुधाकर) > सदस्य, प्रबंध समिति, जूनियर इंजीनियर संघ, गाजीपुर, उ. प्र.
83 डॉ सुभाष चन्द्र (साहित्य सुधाकर) सुभांजलि प्रकाशन, कानपुर
84 डॉ चन्द्र कुमार मिश्र (साहित्य सुधाकर) संस्थापक प्रबन्धक, चन्द्रवाटिका शिक्षा निकेतन, महोना, लखनऊ
85 अमिताभ त्रिवेदी (साहित्य सुधाकर) संपादक, युगवार्ता, लखनऊ
86 डॉ. सनत त्रिवेदी (साहित्य सुधाकर) पूर्व प्रवक्ता, लखनऊ

मंगलवार, 17 जनवरी 2017

महोना में कवितालोक सृजन संस्थान लखनऊ की काव्यशाला का सफल आयोजन

       कवितालोक सृजन संस्थान के तत्वावधान में एक काव्यशाला का आयोजन महोना के चन्द्र वाटिका शिक्षा निकेतन में व्यवस्थापक डॉ० सी.के. मिश्र जी के सौजन्य से किया गया। आयोजन की अध्यक्षता नरेंद्र भूषण जी ने की तथा संयोजन और संचालन युवा कवि राहुल द्विवेदी स्मित ने किया। मुख्य अतिथि के रूप में डॉ अजय प्रसून जी और विशिष्ट अतिथि के रूप में श्री केदार नाथ शुक्ल जी व श्री श्याम फतनपुरी जी उपस्थित रहे। 

         काव्यशाला का प्रारम्भ मंजुल मंज़र लखनवी जी की सुमधुर वाणी वंदना से हुआ । इस अवसर पर अनेक कवियों ने छंद, मुक्तक, गीत, गीतिका, ग़ज़ल, व्यंग्य आदि के द्वारा श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर लिया । कार्यक्रम का महत्व तब और बढ़ गया जब विद्यालय के बच्चों ने अपनी जिज्ञासु प्रवृत्ति के आधार पर मंचासीन अतिथि व विशेषज्ञों से साहित्य व कविता के सन्दर्भ में अपने प्रश्न पूछे और उनका संतुष्टि पूर्ण उत्तर प्राप्त किया । प्रश्न पूछने वाले बच्चों में सूरज कुमार (कक्षा-१०), आकृति मौर्या (कक्षा-९), बुशरा फातिमा (कक्षा-९) आदि प्रमुख रहे ।
           कार्यक्रम में कवितालोक सृजन संस्थान के संरक्षक ओम नीरव जी ने 'विश्व विधायक' साप्ताहिक समाचार पत्र के सम्पादक व कवि श्री मृत्युंजय प्रसाद गुप्त जी को 'कविता लोक रत्न' सारस्वत सम्मान से सम्मानित किया ।
          इस अवसर पर अध्यक्षीय काव्यपाठ करते हुए नरेंद्र भूषण जी ने:----
' है अधिक ऊँचा नहीं ये आसमाँ,
सिर जरा ऊँचा उठाकर देखिये ।
आईने में खुद दिखेंगे अजनबी,
आप यदि आँखें मिलाकर देखिये ।।'
सुनाकर कार्यक्रम को उत्कृष्टता प्रदान की ।
         कविता लोक के संरक्षक ओम नीरव जी ने:---
'ओ शमा, छंद हूँ मैं पतंगा नहीं,
ख्याति की ज्योति में मैं जलूँगा नहीं ।'
पंक्तियों में एक सच्चे कवि के हृदय की भावनाओं को स्वर दिए ।
         कार्यक्रम के मुख्य अतिथि व देश के प्रसिद्ध गीतकार डॉ. अजय प्रसून जी ने:---
'एक बून्द तो क्या ये,
मरु का सागर पचा रही है ।
मृगतृष्णा हमको दलदल में,
कब से नचा रही है ।'
सुनाकर श्रोताओं को झूमने पर विवश कर दिया ।
           सीतापुर से पधारे व मंचों के सशक्त हस्ताक्षर केदार नाथ शुक्ल जी ने:-----
'गांधी के तन पर भले अभी
दिखलाती एक लँगोटी है ।
पर उनके चेलों ने तिकड़म
से रकम पीट ली मोटी है । '
जैसी पंक्तियों से वर्तमान भ्रष्ट व्यवस्था पर जोरदार तमाचा जड़ा और जनमानस को सोंचने पर विवश किया ।
       श्याम फतनपुरी जी ने:---
'सारे तीरथ आ जाते हैं,
उन चरणों की सेवा में ।
माई- बाबू की सेवा में
चारो धाम हमारा हो ।'
सुनाकर सभी को भारतीय संस्कृति में संस्कारों की महत्ता का स्मरण करा दिया ।
       उमाकान्त पांडे जी ने:----
''हमारे देश की सरहद को
दुश्मन छू नहीं सकता,
तिरंगा हाथ में है दिल में
हिंदुस्तान जिन्दा है ।''
सुनाकर देश के हर नागरिक के देश के प्रति उद्गारों को आवाज दी ।
       शशि सौरभ जी ने दोहा छंद में:---
'बैल खड़े हैं खेत में, रोता रहा किसान । हरियाली को काट के पछताए इंसान ।।'
दोहा पढ़कर तालियां बटोरीं ।
        मुकेश कुमार मिश्र ने:/----
' जो चाहते हो राम राज लाना उठो
आज ही राम का रूप धारो ।'
पढ़कर आज के सामजिक परिवेश में एक महत्वपूर्ण आवश्यकता को स्वर दिया ।
       परमहंस मिश्र 'प्रचंड' जी ने
'अभी भंग कितनी घुलेगी,
पूछती टूटकर चूड़ियाँ ।'
पंक्तियाँ पढ़कर खूब तालियाँ बटोरीं ।
       मन्जुल मन्ज़र लखनवी जी ने
'चाह मरती ही नहीं जिस्म ये मर जायेगा ।
प्राण खुशबू है हवाओ में बिखर जायेगा ।'
गीतिका को अपनी जादुई आवाज में सुनाकर शमा बाँध दिया और भरपूर तालियां बटोरीं ।
         गौरव पांडे रूद्र ने
'साये मायूसी चारों तरफ ही,
आस का दीपक जलाओ तुम जरा ।'
सुनाकर खूब वाहवाही प्राप्त की ।
         आलमबाग से पधारे मनमोहन सिंह भाटिया 'दर्द लखनवी' जी ने '
इक नज़र देख लो हम सँवर जायेंगे,
बिगड़े हालात सारे सुधर जायेंगे ।'
ग़ज़ल पढ़ी तो श्रोता झूम उठे और वाह वाह और तालियों से सदन गूँज उठा ।
         विश्व विधायक साप्ताहिक समाचार पत्र के सम्पादक मृत्युंजय प्रसाद गुप्त जी ने
'अपनी सेवा है प्रकाश
करना जग सद्गुण फैले,
रंच मात्र भी रहे न रीता
समय जो अवगुण परखे ।'
पंक्तियों के माध्यम से जन मन को जाग्रत करने का प्रयास किया ।
       डॉ. शर्मेश शर्मा जी ने '
सदा सौहार्द की संवेदनाएं लेके चलते हैं ।
प्रफुल्लित हों सभी ऐसी फिजायें लेके चलते हैं ।'
जैसी उत्कृष्ट मंचीय व साहित्यिक रचनाओं के माध्यम से श्रोताओं को भरपूर रसपान कराया ।
       राजेंद्र द्विवेदी जी ने
'इकरार पा गया हूँ इंकार करते-करते ।
मैं मैं नहीं रहा हूँ दीदार करते करते ।'
रचना सुनाई ।
        लखनऊ के जाने माने हास्य कवि चेतराम अज्ञानी जी ने '
आपन चाहति हौ गान अगर,
करौ सिखव सम्मान ।
दुस्मनहु का द्वार पर,
करौ न तुम अपमान ।'
जैसी व्यंगात्मक व प्रेरणाप्रद रचनाएँ सुनाकर श्रोताओं को ठहाके लगाने व चिंतन करने हेतु विवश कर दिया ।
      आभा चंद्रा जी ने '
ये जो दुनिया है दायिमी कम है,
गम बहोत है ख़ुशी कम है ।'
सुनाकर जीवन का दार्शनिक स्वरूप प्रस्तुत किया ।
      भैरोनाथ पांडेय ने
' छेड़कर कल्पनाओं में तुमको,
मन ही मन खुश हो रहे हैं ।'
जैसी श्रृंगार रस से सराबोर रचनाएँ सुनकर खूब तालियां बटोरीं ।
       विपिन मलीहाबादी जी ने
'वे प्यार देखो कर रहे हैं गुठली मार के,
कैसे वफ़ा निभा रहे हैं गुठली मार के ।'
अपने ही अनोखे अंदाज में सुनाकर सभी को अपना मुरीद बना लिया ।
       नीरज द्विवेदी ने '
गलत पिता को ही करे, साबित पुत्र महान ।
मन मसोसता है पिता, दोष स्वयं का मान ।।'
दोहे के माध्यम से आज की पीढ़ी पर जमकर तीखे व्यंग किये ।
      सुरेखा अग्रवाल जी ने '
कितनी लफ्जों में सिमटती ये औरतें....
आबो हवा का असर यूँ हुआ .....'
जैसी पंक्तियों से न सिर्फ राजनीति पर जमकर प्रहार किए साथ ही आज की नारी की व्यथा को भी सबके सामने रखा और खूब सराहना बटोरी ।
      महेश अष्ठाना जी ने
'राजनीति ने बेड़ा गर्त कर दिया यारों,
बाप बाप न रहा बेटा बाप हुआ यारों ।'
पंक्तियों के माध्यम से वर्तमान उत्तर प्रदेश की राजनीति पर तीखे व्यंग किये और सराहना प्राप्त की ।
     सीमा मधुरिमा जी ने
' तुमने पूछा मैं कौन हूँ...
तो सुनो मैं हूँ तथाकथित नारी शक्ति...'
जैसी पंक्तियों से इस पुरुष प्रधान समाज को मुंहतोड़ जवाब देते हुए उन्हें सोंचने पर विवश कर दिया ।
          आज कवि योगेश चौहान ने
'वीर गति से पूर्व कहा होगा दुश्मन को भून दिया,
पत्नी को सिंदूर दिया माता को हमने खून दिया ।'
पंक्तियों में ओजपूर्ण काव्य पाठ प्रस्तुत किया ।
         प्रतापगढ़ से आये आशुतोष 'आशु' जी ने
'खेत खलिहान हो या ढाबा व दुकान कोई,
करने में काम तन काला फिर हो गया ।'
सुनाकर कर्म का सन्देश देते हुए खून तालियाँ बटोरीं ।
        कार्यक्रम के संयोजक व संचालक राहुल द्विवेदी 'स्मित' ने '
जिन आँखों में बंजर दुनिया,
उनकी खातिर पत्थर दुनिया ।'
पंक्तियों को प्रवाह देते हुए गीत के माध्यम से मानवीय सम्वेदनाओं का दार्शनिक स्वरूप प्रस्तुत किया ।
अंत में कविता लोक व काव्यशाला के संरक्षक ओम नीरव जी ने सभी रचनाकारों द्वारा प्रस्तुत रचनाओं की छंद व काव्य के तत्वों के आधार पर संक्षिप्त समीक्षा की व छंद व काव्य की बारीकियों से सभी को अवगत कराया ।

कवितालोक

दिनांक:--- 17/01/2017

रविवार, 1 जनवरी 2017

कवितालोक सृजन संस्थान लखनऊ के षष्ठम गीतिका समारोह का आयोजन

संध्या जी को गीतिका रत्न व निवेदिता जी को कवितालोक रत्न
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कवितालोक सृजन संस्थान के छठे गीतिका समारोह का आयोजन ओम कुटीर
पर प्रख्यात नवगीतकार मधुकर अष्ठाना जी की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। ओम नीरव के संयोजन और राहुल द्विवेदी स्मित जी के संचालन में सम्पन्न इस समारोह में मुख्य अतिथि प्रख्यात गीतकार शिवभजन कमलेश जी और विशिष्ट अतिथि केदार नाथ शुक्ल जी ने मंच को गरिमा प्रदान की। इस अवसर पर हिन्दी भाषा का गौरव बढ़ाने वाली गीतिका-विधा के सृजन-संवर्धन के लिए कवयित्री संध्या सिंह जी को 'गीतिका रत्न' से और हिन्दी कविता के संवर्धन में विशिष्ट योगदान के लिए कवयित्री निवेदिता श्रीवास्तव जी को 'कवितालोक रत्न' से सम्मानित किया गया। शिवभजन  कमलेश जी की सुमधुर वाणी वंदना से प्रारम्भ हुए काव्य पाठ के क्रम में ब्रजेश नीरज जी ने सुमेरु छंद पर आधारित गीतिका के युग्मों पर श्रोताओं की भरपूर तालियाँ प्राप्त कीं -
खुशी है गाँव अपने जा रहा हूँ।
महक मिट्टी की सोंधी पा रहा हूँ।
मचानों पर जो मैंने चढ़ के देखा,
हिमालय को भी छोटा पा रहा हूँ।
संध्या सिंह जी ने मापनी गालगागा गालगागा गालगागा पर आधारित गीतिका  सुनाकर सभी को सम्मोहित कर दिया, उनकी गीतिका के मुखड़ा और युग्म -
छोड़ अपना घर सदा बाहर फिरा है।
मन भला कब देह के भीतर पला है।
तुम जिसे मंज़िल समझ कर जी रहे हो,
वह पड़ाओं का महज एक सिलसिला है।
राहुल द्विवेदी जी ने गीतिका छंद पर आधारित गीतिका में गीतिका विधा की विशिष्टता को व्यक्त कर श्रोताओं को मुग्ध कर लिया -
पुष्प सुरभित सुगंधित विधा गीतिका,
लो चली हो व्यवस्थित विधा गीतिका।
ओम नीरव जी ने नव वर्ष के स्वागत में लावणी छंद पर आधारित गीतिका सुनाते हुए कहा-
फसलें आज गयीं जो बोयी, वे कल को लहराएंगी।
सोलह की गदरायी कलियाँ, सत्रह में खिल जाएंगी।
घोर अभावों के घर पलकर, राजा रंक बना कोई, 
आँसू के घर-आँगन को अब, मुसकाने महकाएंगी।
इसी क्रम में मन मोहन बाराकोटी 'तमाचा लखनवी' जी ने अपनी पंक्तियों से ओज का संचार कर दिया -
निज पर सदा भरोसा रखना, अपने मन में धीर धर,
आगे बढ़ते रहो साथियों, तुम लहरों को चीर कर।
राम शंकर वर्मा जी ने गीत 'आ गए हैं ढोलकों की थाप वाले दिन' सुनाकर वाहवाही लूटी तो केदार नाथ शुक्ल जी ने सरसी छंद में ढली इन पंक्तियो पर भरपूर प्रशंसा प्राप्त की-
काशी की है सुबह सिसकती और अवध की शाम,
तम्बू नीचे खड़े विदाई देते हैं श्रीराम।
केवल प्रसाद सत्यम जी ने ग्राम्य जीवन की त्रासदी को कुछ इसप्रकार शब्दायित किया-
गावों की उस महक को, कैसे रखते साथ,
बिके बैल, वन, बाग सब, मिट्टी हुई अनाथ।
कवयित्री निवेदिता श्रीवास्तव जी ने स्वस्तिवाचन को सुंदरता से शब्दायित किय। प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा जी ने नव वर्ष की रहस्यात्मक अनुभूति को कुछ इसप्रकार शब्द दिये-
विगत आगत मध्य जीवन चक्र चल रहा,
खिले पुष्प से द्वार पर करते हम वंदन।
महेश प्रसाद अष्ठाना जी ने युग के पथिक को इन शब्दों में प्राण ऊर्जा प्रदान की-
कभी थको मत, कभी रुको मत, कभी न बैठो हार कर, 
लड़ना होगा, लड़ना होगा, तूफानों को पार कर।
शिवभजन कमलेश जी ने गीतों की सलिला प्रवाहित करने के साथ नए साल के स्वागत में प्रस्तुत मनहर घनाक्षरी छंद की इन पंक्तियों पर श्रोताओं को वाह-वाह करने को विवश कर दिया-
राम करे अन्न जल का कहीं न हो अभाव,
और कहीं भी अकाल मृत्यु का न फेरा हो।
प्रेम और ज्ञान का हो संचरण कमलेश,
नित्य नए रंग में उमंग का सवेरा हो।
अध्यक्षीय काव्य पाठ करते हुए मधुकर अष्ठाना जी उत्कृष्ट बिम्ब यूजनाओं से युक्त नव गीतों के प्रस्तुतीकरण से सभी को भाव विभोर कर दिया, उनकी इन  पंक्तियों पर श्रोता झूम उठे-
सपने ही देखते रहे हम, और उमर आ गयी किनारे,
टूट गया जब अपनों का भ्रम, रहे भंवर में बिना सहारे।
अंत में समाजसेवी शिक्षक रवि कान्त मिश्र जी ने सभी आगंतुकों का आभार व्यक्त किया।
             -:कवितालोक:-