ओम नीरव

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

हिंदी छंदों का समादर करता एक दुर्लभ सन्दर्भ ग्रन्थ-'गीतिकालोक'

Deepak Goswami 
गीतिकालोक समीक्षा
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                दिनांक ०७ अप्रैल २०१६ का दिवस मेरे लिए एक अविस्मरणीय दिवस बन गया है. इस दिन मुझे सुलतानपुर उत्तर प्रदेश में भाई अवनीश त्रिपाठी जी के संयोजन में कवितालोक सर्द्धशतकीय महाकुम्भ में स्नान का पावन अवसर मिला. अनेक साहित्य मनीषियों के दिव्य दर्शन के साथ साथ उनके काव्य सुधा पान का भी अवसर प्राप्त हुआ. इसी अवसर पर साक्षात्कार हुआ हिंदी साहित्य की गीता  "गीतिकालोक " से .
            "गीतिकालोक " परम श्रद्धेय ओम नीरव जी द्वारा सम्पादित एक दुर्लभ ग्रन्थ है. जो मेरे अनुसार प्रत्येक साहित्यकार के पास सन्दर्भ ग्रन्थ के रूप में होना ही चाहिए.इस ग्रन्थ में गुरुदेव नीरव जी ने बड़े ही सरल व स्पष्ट शैली में सनातनी हिंदी छन्दों को समझाया है, और बड़े ही सुन्दर व मनमोहक उदाहरणों से छन्दों से परिचय कराया है.इस ग्रन्थ का सबसे महत्वपूर्ण सोपान है "गीतिका" जो एक नई विधा है,यह पारम्परिक उर्दू ग़ज़ल को कुछ नए आयाम के द्वारा उसमें हिंदी की सोंधी सुगंध भर कर स्थापित की गई है. गुरूवर ओम नीरव जी के शब्दों में -
"गीतिका एक ऐसी ग़ज़ल है जिसमें हिंदी भाषा की प्रधानता है,हिंदी व्याकरण की अनिवार्यता है और पारम्परिक मापनियों के साथ हिंदी छन्दों का समादर है "
                गुरुवर ने पिछले लगभग दो वर्षोंं से "फेसबुक " सोशल मीडिया के माध्यम से अपने सुप्रसिद्ध समूहों "कवितालोक" व "गीतिकालोक " के द्वारा गीतिका को हिंदी साहित्य में एक अलग विधा के रूप में स्थापित करने का पूर्ण रूपेण सफल प्रयास किया है. आदरणीय नीरव जी व उनके मुझ जैसे अनेक शिष्यों के अनवरत श्रम की परिणीति ही इस "गीतिकालोक " ग्रन्थ के रूप में प्रकट हुई है.
            "गीतिकलोक" ग्रन्थ दो भागों में विभाजित है . भाग-१ :गीतिका विधा भाग-२ : गीतिका संकलन . गुरुवर ने प्रथम भाग में १९ बिंदुओं द्वारा गीतिका विधा के, तकनीकी शब्दावली ,मात्रा भार, तुकांत विधान, मापनी, आधार छन्द , छन्दों का वर्गीकरण व परिचय , गीतिका का ताना बाना, गीतिका और उर्दू ग़ज़ल में तुलना , गीतिका की भाषा आदि के द्वारा गीतिका विधा को समझाया है. इसके अतिरिक्त यह भी बताया है की इसका गीतिका नाम ही क्यों रखा गया है,गीतिका कैसे रची जाय. मुक्तक का मर्म बिंदु के अंतर्गत मुक्तक विधा पर भी प्रकाश डाला है.
             इस ग्रन्थ के दूसरे भाग में सत्तासी (८७) गीतिकाकारों की १६१ श्रेष्ठ गीतिकाओं का संकलन प्रकाशित है,जिसमें प्रत्येक गीतिका के साथ संक्षिप्त शिल्पविधान व रचनाकार का संक्षिप्त परिचय भी दिया गया है. यह मेरा भी परम सौभाग्य है कि मुझ अल्पज्ञ की भी दो गीतिकाओं को पृष्ठ संख्या २२६-२२७ पर स्थान दिया गया है कुल मिला कर यह ग्रन्थ गीतिकालोक हिंदी साहित्य के इतिहास में मील का पत्थर साबित होगा. मैं अपने एक मुक्तक द्वारा परम आदरणीय गुरुवर ओम नीरव जी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए लेखनी को विराम दूंगा।

जय मां शारदे.
दीपक गोस्वामी
बहजोई,मुरादाबाद उत्तर प्रदेश