ओम नीरव

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

'गीतिकालोक'-- हिंदी छंदों का समादर

महेश जैन ‘ज्योति’ 
गीतिकालोक : अभिमत
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"गीतिका विधा अब किसी परिचय की मोहताज नहीं । हिन्दी के साहित्याकाश में , गीतिका अब अन्य सनातन छन्दों की भाँति नक्षत्र की तरह स्थापित हो चुकी है और इसका श्रेय जाता है श्री ओम नीरव जी को ...! "
कल ही श्री नीरव जी द्वारा रचित व सम्पादित गीतिका लोक प्राप्त हुई ,जिसका मुझे बेसब्री से इंतजार था । मुखपृष्ठ को मंत्रमुग्ध सा निर्निमेष देखता रह गया । है ही इतना मनोहारी । लगा जैसे सत्य ही गीतिकालोक साकार हो गया हो । इन्द्रधनुषी आकाश में अटक सा गया मन । वाह ! मन ने कहा कि ..'ये है हमारा गीतिकालोक !'
आवरण के पृष्ठ पर बिखरीं थीं टटीरी की स्मृतियाँ । माँ वाणी को श्रद्धा सुमन और फिर शुभकामनाओँ के शब्द गुच्छ । अपनी बात में नीरव जी कहते हैं ...
"गीतिका एक ऐसी गजल है जिसमें हिन्दी भाषा की प्रधानता हो ,हिन्दी व्याकरण की अनिवार्यता हो और पारम्परिक मापनियों के साथ हिन्दी छन्दों का समादर हो । " उन्होंने यह स्पष्ट रूप से दिखा दिया है कि आज गीतिका का आँगन हिन्दी का है और इतर भाषाओँ के शब्द यहाँ सम्मानित आगंतुक हैं ।
              अनेक वर्षों के श्रम और मंथन के पश्चात ,गीतिका विधा की स्थापना हेतु आपने तकनीकी शब्दावली, मात्राभार , तुकान्त विधान ,  मापनियों का विज्ञान ,  छन्दों के प्रकार ,  मापनीमुक्त और युक्त मात्रिक व वर्णिक छन्दों का वर्णन तो ग्रन्थ में किया ही है , गीतिका व गजल में अंतर व समानतायें तथा गीतिका नाम पर भी विस्तार से प्रकाश डाला हैऔर गीतिका को वैज्ञानिक रूप से ठोस धरातल प्रदान किया है ।
                दूसरे भाग में छंदों और मापनियों पर आधारित , रचनाकारों की रचनायें हैं जो पाठक को विभिन्न रस-रंगों से सराबोर करने में सक्षम हैं । विनती , प्रार्थना , भक्ति , ममता , वात्सल्य , स्नेह ,  प्रेम , शृंगार ,देशभक्ति ,जीवन , जिन्दगी , आँसू और मुस्कान के भाव बिखेरती गीतिकायें पढकर मन ठगा सा रह जाता है । ऐसा कोई भाव नहीं जिसे छुआ न गया हो और ऐसा कोई रस नहीं जिसे बरसाया न गया हो ।
          गीतिकालोक को प्रस्तुत करने में श्री नीरव जी के इस भगीरथ श्रम को बार-बार नमन । उनकी निष्काम साहित्य साधना को पुनि-पुनि प्रणाम ।
नमन कवितालोक ।
जय भारत ।

-महेश जैन 'ज्योति' ,
6-बैंक कालोनी , महोली रोड ,
मथुरा ।