मंगलवार, 24 मई 2016

काव्य गोष्ठी इटौंजा लखनऊ

            अखिल भरतीय सृजन संस्थान "कवितालोक" के तत्वावधान में प्रथम काव्यशाला का आयोजन इटौंजा की डी पी एस अकादमी में व्यवस्थापिका श्रीमती शैल सिंह के सौजन्य से दिनांक 21 मई 2016 को किया गया। आयोजन की अध्यक्षता कवि श्रेष्ठ श्री शरद पाण्डे 'शशांक' जी ने की और संयोजन एवं संचालन युवा कवि राहुल द्विवेदी स्मित ने किया। मुख्य अतिथि के रूप में श्री कुमार तरल जी और विशिष्ट अतिथि के रूप में श्री अजय प्रसून जी, श्री भ्रमर बैसवारी जी व श्री कमलेश मौर्य 'मृदु' जी उपस्थित रहे। काव्यशाला का प्रारम्भ उमाकांत पाण्डे जी की सुमधुर वाणी वंदना से हुआ जिसके बाद संस्थान के संरक्षक ओम नीरव ने काव्यशाला की रूपरेखा पर प्रकाश डालते हुए कहा की वनिता के सौंदर्य में मर्यादा का जो स्थान है , कविता के सौंदर्य में शिल्प का वही स्थान है । इस अवसर पर अनेक कवियों ने छंद, मुक्तक, गीत, गीतिका, ग़ज़ल, व्यंग्य आदि के द्वारा श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर लिया ।

        अंत मे उमाकांत पाण्डेय 'सरस' जी व गौरव पाण्डेय जी की रचनाओं की समीक्षा करते हुए ओम नीरवजी ने काव्य शिल्प के महत्वपूर्ण तत्वों पर प्रकाश डाला और यह घोषणा भी की कि कवितालोक की ऐसी ही मासिक काव्यशालाओं का आयोजन लखनऊ के विकास नगर और नाका हिंडोला के साथ-साथ सुल्तानपुर, टटीरी बागपत, जयपुर, सालासर (राजस्थान) आदि स्थलों पर आगामी मासों में प्रारम्भ होने जा रहा है । इस अवसर पर काव्य पाठ करने वाले कवियों में मुख्य थे - शरद पाण्डे शशांक जी, कुमार तरल जी , भ्रमर बैसवारी जी, अजय प्रसून जी , कमलेश मौर्य मृदु जी , कमल किशोर अवस्थी जी , केवल प्रसाद सत्यम जी, उमाकांत पाण्डे जी , गौरव पाण्डे रूद्र जी, राहुल द्विवेदी 'स्मित' जी , शिवांगी दीक्षित, हरीश लोहुमी जी, राजेन्द्र शुक्ल 'राज' जी, अशोक अवस्थी जी, मंजुल मंजर जी, संजय सांवरा जी, कलीम इटौन्जवी जी, मुकेश कुमार मिश्र जी, सर्वेश श्रीवास्तव 'सरस' जी, मनमोहन बाराकोटी जी, राजेन्द्र कुमार शुक्ल राज जी, मज़हर अली अब्बास जी, भैरव नाथ पाण्डे जी, सुंदर लाल सुन्दर जी, भानु प्रताप मौर्य 'अंश' जी, गोबर गणेश जी, अनिल अनाड़ी जी, गौरी शंकर वैश्य 'विनम्र' जी, सचिन मिश्र जी, संदीप अनुरागी जी, शिखर अवस्थी जी , मिजाज लखनवी जी, सरोजनी सिंह जी आदि।

             कवितालोक, लखनऊ

शनिवार, 21 मई 2016

गीतिका का ताना-बाना

OM NEERAV, LUCKNOW
          
           प्रस्तावना - ग़ज़ल एक काव्य विधा है जिसका प्रयोग किसी भी भाषा में किया जा सकता है ! इसलिए ग़ज़ल विधा को उर्दू की सीमित परिधि से बाहर निकालकर विस्तार देने के लिए हिंदी में ग़ज़ल लेखन को प्रोत्साहित करना आवश्यक है l
        बहती सरिता का जल निर्मल रहता है जबकि ठहरे हुए पोखर का जल सड़ने लगता है इसलिए ग़ज़ल को विस्तार देना अपरिहार्य है , 'ग़ज़ल को ग़ज़ल ही रहने देना' उचित नहीं है l  
              हिंदी भाषा और हिन्ही व्याकरण में लिखी ग़ज़ल को एक अलग नाम 'गीतिका' देने की भी आवशयकता है , इससे जहां एक ओर उर्दू ग़ज़ल का मौलिक स्वरुप अक्षुण्ण रहेगा , वहीँ दूसरी ओर 'गीतिका' को भी एक स्वतंत्र विधा के रूप में सम्मान से देखा जा सकेगा !
            गीतिका एक हिंदी छंद का नाम भी है किन्तु यह संयोग मात्र है , उस छंद से इस 'गीतिका' का कोई साम्य  नहीं है ! मेरी जानकारी के अनुसार इस परिप्रेक्ष्य में 'गीतिका' शब्द का प्रयोग सर्व प्रथम राष्ट्रीय कवि पद्म श्री गोपाल दास नीरज जी के द्वारा किया गया था ! अस्तु 'गीतिका' की प्रस्तुत अभिधारणा श्रद्धेय नीरज जी को साभार सप्रेम समर्पित है !

गीतिका की मुख्य अभिधारणाएं निम्नवत हैं --
(1)  हिंदी भाषा और व्याकरण में रची गयी ग़ज़ल को 'गीतिका' कहते हैं l इसे 'हिंदी ग़ज़ल' भी कह सकते है l गीतिका का छंदानुशासन वही है जो ग़ज़ल का है किन्तु भाषा , व्याकरण एवं अन्य मान्यताएं हिंदी की हैं l दोनों की समानता अग्र लिखित विन्दु (2) से (6) तक तथा भिन्नता विन्दु (7) से आगे तक स्पष्ट की गयी है l

 गीतिका और ग़ज़ल में समानताएं-------
(2) गीतिका की एक निश्चित 'मापनी' (बहर) होती है जो वास्तव में मात्राओं का एक निश्चित क्रम है जैसे -२१२ २१२ २१२ २१२ अथवा गालगा गालगा गालगा गालगा अथवा फाइलुन फाइलुन फाइलुन फाइलुन ! गीतिका के सभी 'पद' (मिसरे) एक ही मापनी में होते हैं !
(3) गीतिका में दो-दो पदों के कम से कम पाँच युग्म (शेर) होते हैं ! प्रत्येक युग्म का अर्थ अपने में पूर्ण होता है अर्थात वह अपने अर्थ के लिये किसी दूसरे युग्म का मुखापेक्षी नहीं होता है ! गीतिका के युग्म की एक 'विशेष कहन' होती है , जिसे विशिष्ट शैली , वक्रोक्ति ,अन्योक्ति ,बाँकपन या व्यंजना के रूप में भी देखा जा सकता है , ऐसा कुछ भी न हो तो सपाट भाषण या अभिधा से गीतिका का युग्म नहीं बनता है !
(4) पहले युग्म के दोनों पद तुकान्त होते है , इस युग्म को 'मुखड़ा' (मतला) कहते हैं ! बाद के प्रत्येक युग्म की पहली पंक्ति अनिवार्यतः अतुकांत होती है जिसे 'पूर्व पद' (मिसरा ऊला) कहते हैं तथा दूसरी पंक्ति तुकांत होती है , जिसे 'पूरक पद' (मिसरा सानी) कहते हैं ! अंतिम युग्म में यदि रचनाकार का उपनाम आता है तो उसे 'मनका' (मक्ता) कहते हैं !
(5) पूरी गीतिका में तुकान्त एक सामान रहता है l तुकान्त में दो खंड होते है -- अंत के जो शब्द सभी पंक्तियों में सामान होते हैं उन्हें 'पदान्त' (रदीफ़) कहते हैं तथा उसके पहले के शब्दों में जो अंतिम अंश सामान रहता है उसे 'समान्त' (काफिया) कहते हैं ! कुछ गीतिकाओं में पदांत नहीं होता है , ऐसी गीतिकाओं को 'अपदान्त गीतिका' (ग़ैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल) कहते हैं !
(6) संक्षेप में कोई रचना तभी गीतिका हो सकती है जब उसमे पाँच बातें हों -- १. मापनी (बहर) २. पदान्त-समान्त (रदीफ़-काफिया) ३. मुखड़ा (मतला) ४. कम से कम पांच युग्म (शेर/अश'आर) ५. विशेष कहन l

गीतिका और ग़ज़ल में भिन्नताएं --------
(7) 'गीतिका' में हिंदी शब्दों का प्रयोग प्रमुखता से होना चाहिए किन्तु इतर भाषाओँ जैसे उर्दू , अंग्रेजी आदि के लोक प्रचलित शब्दों को भी सप्रेम स्वीकार किया जाना चाहिए l
इतर भाषाओँ जैसे उर्दू , अंग्रेजी आदि के लोक प्रचलित शब्दों का प्रयोग होता है तो उन शब्दों का प्रयोग उसी रूप में होना चाहिए जिस रूप में वे हिंदी में बोले जाते हैं और उन शब्दों पर वर्तनी और व्याकरण हिंदी की ही लागू होनी चाहिए ! किसके स्थान पर क्या अपेक्षित है , इसके कुछ उदहारण केवल बात को स्पष्ट करने के लिए --
शह्र > शहर , नज्र > नज़र , फस्ल > फसल , नस्ल > नसल काबिले-तारीफ़ > तारीफ़ के क़ाबिल , दर्दे-दिल > दिल का दर्द, दिलो-जान > दिल - जान , सुबहो-शाम > सुबह - शाम ,, आसमां > आसमान , ज़मीं > ज़मीन, अश'आर > शेरों , बहूर > बहरों , सवालात > सवालों , मोबाइल्स > मोबाइलों , चैनेल्स > चैनलों
 (8) मात्राभार की गणना , संधि - समास , तुकांतता या समान्तता आदि का निर्धारण हिंदी व्याकरण के अनुसार ही मान्य है l
(9) 'गीतिका' में अकार-योग (अलिफ़-वस्ल) जैसे 'हम अपना' को 'हमपना' पढ़ना , पुच्छ-लोप (पद के अंतिम लघु का लोप) जैसे 'पद के अंत में आने पर 'कबीर' को 12 मात्राभार में 'कबीर्' या 'कबी' जैसा पढना , समान्ताभास (ईता-दोष) जैसे 'चलना' और 'बचना' में समान्त दोषपूर्ण मानना आदि हिंदी व्याकरण के अनुरूप न होने के कारण मान्य नहीं हैं l इनके स्थान पर हिंदी भाषा व्याकरण के अपने नियम ही मान्य हैं l
(10) गीतिका के पदों की मापनी उर्दू मापनी (उर्दू बहर) के साथ-साथ किसी सनातनी छन्द या लोक छंद या किसी स्वैच्छिक लय पर भी आधारित हो सकती है l जो भी आधार हो उसका आदि से अंत तक सुनिश्चित अनुपालन होना चाहिए l
(11) गीतिका की चर्चा में हिंदी पदावली को चलन में लाने का प्रयास किया जाएगा किन्तु पहले से प्रचलित उर्दू पदावली की उपेक्षा नहीं की जाएगी l कुछ उदहारण --
युग्म = शेर /... गीतिका = हिंदी ग़ज़ल /... पद = मिसरा /... पूर्व पद = मिसरा ऊला /... पूरक पद = मिसरा सानी /... पदान्त = रदीफ़ /... समान्त = काफिया /... मुखड़ा = मतला /... मनका = मक़ता /... प्रवाह = रवानी /... कहन = बयाँ /... शैली = अंदाज़ /... कहन की शैली = अंदाज़े-बयाँ /... मापनी = बहर /... स्वरक = रुक्न /... स्वरकावली = अरकान /... मात्रा भार = वज़न /... कलन = तख्तीअ /... मौलिक मापनी = सालिम बहर /... मिश्रित मापनी = मुरक्कब बहर /... पदांत समता दोष = एबे-तकाबुले-रदीफ़ /... अपदान्त गीतिका = ग़ैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल /... अकार योग = अलिफ़ वस्ल /... पुच्छ लोप = मिसरे के अंतिम लघु का लोप /... समान्ताभास = ईता /... धारावाही गीतिका = मुसल्सल ग़ज़ल.... इस पदावली में प्रयुक्त पदों के स्थान पर यदि कोई दूसरा अच्छा सुझाव आता है तो उसपर ससम्मान विचार किया जायेगा !

(12) अंततः यह भी स्पष्ट कर देना उपयुक्त होगा कि------
====================================================
'गीतिका' के रूप में ऐसी प्रत्येक 'ग़ज़ल' मान्य है जिसमे हिंदी व्याकरण की अवहेलना
न हो और उर्दू के दुरूह अप्रचलित शब्दों का प्रयोग न हो l
====================================================
उदहारण : -------------
हिंदी गजल : 'सच मानिए'

क्षम्य कुछ भी नहीं, बात सच मानिए !
भोग ही है क्षमा , तात सच मानिए !

भाग्य तो है क्रिया की सहज प्रति-क्रिया ,
हैं नियति-कर्म सहजात सच मानिए !

युद्ध से बच निकलना कला है बड़ी ,
व्यर्थ ही घात-प्रतिघात, सच मानिए !

घूमते हैं समय की परिधि पर सभी ,
कुछ नहीं पूर्व-पश्चात, सच मानिए !

वह अभागा गिरा मूल से , भूल पर -
कर सका जो न दृगपात सच मानिए !

सत्य का बिम्ब ही देखते हैं सभी ,
आजतक सत्य अज्ञात ,सच मानिये !
 .......... ओम नीरव , लखनऊ.

विन्दुवत व्याख्या :-------------------
(2) मापनी (बहर) -
२१२ २१२ २१२ २१२ ... अथवा
गालगा गालगा गालगा गालगा ... अथवा
फाइलुन फाइलुन फाइलुन फाइलुन
इनमे से पहली प्रणाली को सामान्यतः 'मात्राक्रम' , दूसरी प्रणाली को 'लगावली' और तीसरी प्रणाली को 'अरकान' के नाम से जाना जाता है l
(3) इसमें दो-दो पदों (मिसरों) के छः युग्म (शेर/अश'आर) हैं , कम से कम पांच युग्म होने चाहिए !
(4) पहले युग्म अर्थात मुखड़ा (मतला) के पद तुकांत है , जबकि बाद के प्रत्येक युग्म का पूर्व पद (मिसरा ऊला) अतुकांत और पूरक पद (मिसरा सानी) तुकान्त है ! अंतिम युग्म में उपनाम नहीं आया है , इसलिए इसे मनका (मक़ता) नहीं कहा जा सकता है !
(5) पूरी गीतिका का तुकान्त है - 'आत सच मानिए' , जिसके दो खंड हैं :- पहला समान्त (काफिया) - 'आत' और दूसरा पदान्त(रदीफ़) - 'सच मानिए' ! संक्षेप में --
तुकांत = समान्त + पदांत
आत सच मानिए = आत + सच मानिए
(6) विशिष्ट कहन की बात का निर्णय आप स्वयं करके देखें , जिस युग्म में वह विशेष कहन न हो उसे गीतिका का युग्म न मानें या दुर्बल युग्म मानें !
मित्रों ! विवादों से बचने के लिए मैंने अपनी गीतिका को ही उदहारण के रूप में लिया है जो बहुत उत्तम नहीं है ! बाद में कोई उपयुक्त अन्य उदहारण मिलने पर मैं इसे बदल दूंगा !
गीतिका के सृजन - संवर्धन में आपकी सहभागिता सादर प्रार्थित है ! सप्रेम !
                                -----------ओम नीरव, कवितालोक , लखनऊ


विधाएं (२) मात्राभार

विधाएं : मात्राभार~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

छन्द बद्ध रचना के लिये मात्राभार की गणना का ज्ञान आवश्यक है , इसके निम्न
लिखित नियम हैं :-

(१) ह्रस्व स्वरों की मात्रा १ होती है जिसे लघु कहते हैं , जैसे - अ, इ, उ, ऋ
(२) दीर्घ स्वरों की मात्रा २ होती है जिसे गुरु कहते हैं,जैसे-आ, ई, ऊ, ए,ऐ,ओ,औ
(३) व्यंजनों की मात्रा १ होती है , जैसे -
.... क,ख,ग,घ / च,छ,ज,झ,ञ / ट,ठ,ड,ढ,ण / त,थ,द,ध,न / प,फ,ब,भ,म /
.... य,र,ल,व,श,ष,स,ह
(४) व्यंजन में ह्रस्व इ , उ की मात्रा लगने पर उसका मात्राभार १ ही रहती है
(५) व्यंजन में दीर्घ स्वर आ,ई,ऊ,ए,ऐ,ओ,औ की मात्रा लगने पर उसका मात्राभार
.... २ हो जाता है
(६) किसी भी वर्ण में अनुनासिक लगने से मात्राभार में कोई अन्तर नहीं पडता है,
.... जैसे - रँग=११ , चाँद=२१ , माँ=२ , आँगन=२११, गाँव=२१
(७) लघु वर्ण के ऊपर अनुस्वार लगने से उसका मात्राभार २ हो जाता है , जैसे -
.... रंग=२१ , अंक=२१ , कंचन=२११ ,घंटा=२२ , पतंगा=१२२
(८) गुरु वर्ण पर अनुस्वार लगने से उसके मात्राभार में कोई अन्तर नहीं पडता है,
.... जैसे - नहीं=१२ , भींच=२१ , छींक=२१ ,
.... कुछ विद्वान इसे अनुनासिक मानते हैं लेकिन मात्राभार यही मानते हैं,
(९) संयुक्ताक्षर का मात्राभार १ (लघु) होता है , जैसे - स्वर=११ , प्रभा=१२
.... श्रम=११ , च्यवन=१११
(१०) संयुक्ताक्षर में ह्रस्व मात्रा लगने से उसका मात्राभार १ (लघु) ही रहता है ,
..... जैसे - प्रिया=१२ , क्रिया=१२ , द्रुम=११ ,च्युत=११, श्रुति=११
(११) संयुक्ताक्षर में दीर्घ मात्रा लगने से उसका मात्राभार २ (गुरु) हो जाता है ,
..... जैसे - भ्राता=२२ , श्याम=२१ , स्नेह=२१ ,स्त्री=२ , स्थान=२१ ,
(१२) संयुक्ताक्षर से पहले वाले लघु वर्ण का मात्राभार २ (गुरु) हो जाता है ,
..... जैसे - नम्र=२१ , सत्य=२१ , विख्यात=२२१
(१३) संयुक्ताक्षर के पहले वाले गुरु वर्ण के मात्राभार में कोई अन्तर नहीं पडता है,
..... जैसे - हास्य=२१ , आत्मा=२२ , सौम्या=२२ , शाश्वत=२११ , भास्कर=२११.
(१४) संयुक्ताक्षर सम्बन्धी नियम (१२) के कुछ अपवाद भी हैं , जिसका आधार 
..... पारंपरिक उच्चारण है , अशुद्ध उच्चारण नहीं !
..... जैसे- तुम्हें=१२ , तुम्हारा/तुम्हारी/तुम्हारे=१२२, जिन्हें=१२, जिन्होंने=१२२,
..... कुम्हार=१२१, कन्हैया=१२२ , मल्हार=121
(15) अपवाद के उदाहरणों में अधिकांशतः संयुक्ताक्षर का परवर्ती अक्षर 'ह' होता है
..... किन्तु यह कोई नियम नहीं है जैसे कुल्हाड़ी=122 जबकि कुल्हड़=211
ओम नीरव कवितालोक लखनऊ

विधा- 'मुक्तक' का तानाबाना

By Om Neerav on Thursday, June 6, 2013 at 11:28am

===========================================
मुक्तक क्या है ?
~~~~~~~~~~~
मुक्तक एक सामान मात्राभार और समान लय (या समान बहर) वाले चार पदों की रचना है जिसका पहला , दूसरा और चौथा पद तुकान्त तथा तीसरा पद अतुकान्त होता है और जिसकी अभिव्यक्ति का केंद्र अंतिम दो पंक्तियों में होता है ! समग्रतः मुक्तक के लक्षण निम्न प्रकार हैं -
१. इसमें चार पद होते हैं
२. चारों पदों के मात्राभार और लय (या बहर) समान होते हैं
३. पहला , दूसरा और चौथा पद तुकान्त होता हैं जबकि तीसरा पद अनिवार्य रूप से अतुकान्त होता है
४. कथ्य कुछ इस प्रकार होता है कि उसका केंद्र विन्दु अंतिम दो पंक्तियों में रहता है , जिनके पूर्ण होते ही पाठक/श्रोता 'वाह' करने पर बाध्य हो जाता है !
५. मुक्तक की कहन कुछ-कुछ  ग़ज़ल के शेर जैसी होती है , इसे वक्रोक्ति , व्यंग्य या अंदाज़-ए-बयाँ के रूप में देख सकते हैं !
उदाहरण :-

आँसुओं का समंदर सुखाया गया ,
अन्त में बूँद भर ही बचाया गया ,
बूँद वह गुनगुनाने लगी ताल पर -
तो उसे गीत में ला छुपाया गया !
................. ओम नीरव. 

विशेष : यह चर्चा लोक प्रचलित मुक्तक की है , काव्य शास्त्रीय परिभषा के अनुसार मुक्तक का अर्थ है - कोई काव्य रचना जो अपने अर्थ को स्पष्ट करने के लिये आत्म निर्भर हो अर्थात किसी दूसरी रचना पर निर्भर न् हो !इस परिभषा के अनुसार प्रबंध काव्यों से इतर प्रायः सभी रचनाएँ "मुक्तक" के अंतर्गत आ जाती है ! छंद शस्त्र मे उन वर्णिक छंदों को भी मुक्तक कहा गया है जिनमे वर्णों की संख्या तो निश्चित होती है किन्तु उनका मात्राभार निश्चित नहीं होता है अर्थात मुक्त होता है जैसे मनहर घनाक्षरी, रूप घनाक्षरी आदि। ...... किन्तु लोक प्रचलित मुक्तक का अभिप्राय वही है जो ऊपर दिया गया है !आपके विचारों का स्वागत है !

ओम नीरव,कवितालोक
लखनऊ 

रविवार, 15 मई 2016

गीतिकालोक- नव्यता के साथ प्राचीन छंदों का गहन चिंतन शोधक ग्रन्थ

डॉ० मंजु लता श्रीवास्तव
*****************************
*****************************

               हिंदी काव्य में छंद- शास्त्र के मूर्धन्य विद्वान 'गीतिकालोक' के प्रणेता आदरणीय श्री ओम नीरव जी का साहित्य जगत में एक विशिष्ट स्थान है। उनके द्वारा लिखित एवं सम्पादित इस महाग्रंथ में लेखक के गहन-चिन्तन, गम्भीर विचार-सरणि,संयमित भाषा-शैली और बोधगम्यता के आधार पर काव्य जगत में 'गीतिकालोक' को एक अति श्रेष्ठ रचना के रूप मे जाना जा सकता है।
             'गीतिकालोक'  नाम सुनते ही कल्पना मेंं एक ऐसा संसार दृश्यमान होने लगता है जिसके विशाल फलक में कोमल भावना,उत्तम विचार और उत्कट जिज्ञासा अनायास ही उभरने लगती है।
        साहित्य की किसी भी विधा में सौंदर्य तभी उत्पन्न होता है जब साहित्य कार चितेरा बनकर रचना को विभिन्न सौंदर्य उपकरणों द्वारा सजाता और सँवारता है। कवि-हृदय की प्रबल अनुभूतियों को साहित्यिक अभिव्यक्ति देने के लिये किसी विशिष्ट विधा का आश्रय लेना पड़ता है।इसके लिए कभी-कभी किसी विद्वान गुरु का मार्ग दर्शन भी आवश्यक होता है।
     शिल्प-विधान के क्षेत्र में विशेष रूप से हिन्दी छंद के विषय में बहुत अधिक भ्राँन्तियाँ फैली हैं जिनको वैज्ञानिक  आधार पर निर्मूल करने का दुष्साध्य कार्य श्री ओम नीरव जी ने किया है।पारम्परिक उर्दू गज़ल में जब हिन्दी भाषा के शब्दों का बहुतायत में प्रयोग होने लगा तो समालोचकों ने उसे एक नया नाम दे दिया।जिसे आज गीतिका के रूप में सम्मान प्राप्त है।हिन्दी के प्रति प्रेम और रुझान को संपोषित करने वाली यह अनु शासित विधा काव्य जगत में नवीन संभावनों के द्वार खोलेगी-ऐसी आशा करनी चाहिए ।
         आद० नीरव जी ने इस इस विधा पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता का अनुभव कियाऔर इस पर अध्ययन तथा मार्ग-दर्शन का कार्य प्रारम्भ कर दिया।उनके द्वारा सुझाई गई इस विधा से आकर्षित होकर अनेक कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से इसका प्रचार और प्रसार किया।अंतत: यह विधा इतनी लोकप्रिय हो गई कि इसने कविता के प्राँगण में धूम मचा दी।
    विवेच्य ग्रंथ को दो भागों में विभाजित किया गया है।प्रथम भाग में विधा का स्वरूप एवं विशेषतायें तथा उसका व्याकरणिक विवेचन अत्यंत सरल सुबोध भाषा में वैज्ञानिक ढ़ग से प्रस्तुत किया गया है। लेखक ने विभिन्न उदाहरणों (अनेक कवियों की रचनाओं) द्वारा विषय की दुरूहता को सरलतम बनाकर जिज्ञासु कवियों का मार्ग प्रशस्त किया है।
        गीतिका में 'लय 'का निर्धारण करने के लिए ' मापनी'और 'छंद' को आधार माना है।मात्रिक और वर्णिक दोनों प्रकार के छंदों को 'मापनीयुक्त' तथा 'मापनीमुक्त' की सीमा में बाँधकर एक अभिनव प्रयोग आद०नीरव जी की मौलिक प्रतिभा का परिचायक है। इस संबन्ध में उन्होने स्वयं लिखा है--" वस्तुत: गीतिका एक ऐसी गज़ल है जिसमें हिंदी भाषा की प्रधानता हो,हिंदी व्याकरण की अनिवार्यता होऔर पारस्परिक मापनियों के साथ हिंदी छंदों का समादर हो।"
         पुस्तक के उत्तरार्ध्य में विभिन्न ख्यातिप्राप्त कवियों की उत्कृष्ट रचनाओं का संकलन है।इसमें सत्तासी गीतिकाकारों की एक सौ इक्कीस रचनाओं को उनके शिल्प विधान के साथ सुशोभित किया गया है।
        कवि-हृदय की दरलीज पर खड़ी वेदना जब बाहर निकलने को विकल होने लगती है तो संवेदनायें शब्दों का जामा पहन कर काव्य की किसी भी विधा में आकार ग्रहण करने लगतीं हैं।लेखक के हृदय की विकल भावना पाठक की सह-अनुभूति पाकर प्रवाहित होती हुई आनन्द सागर में निमग्न हो जाती है।ऐसी ही कोमल -कठोर,उर्जसित-शान्त अनुभूतियों का वृहत-कोष 'गीतिकालोक' अनेक श्रेष्ठ रचनाकारों की सबल लेखनी का लेखा-जोखा है।जिसके माध्यम से कविगण सामाजिक चेतना को झझकोरता हुआ समाज की विसंगत स्थिति पर विचार करने के लिये प्रेरित कर रहा है ।ग्रंथ में कवियों की व्यक्तिगत पीड़ा सामाजिक स्तर पर आकर सम्पूर्ण मानव मन का प्रतिनिधित्व कर रही है।
      प्रस्तुत गीतिकाओं में यदि एक ओर प्रेमऔर सौंदर्य अपने पूर्ण यौवन पर है-जैसे-मतवाले रूप का मनुहार,महकते फूलों का श्रृंगार,प्रीति की बाँसुरी की रसीली तान,सपनों का मदभरा संसारऔर प्रिय की बाँहों का गलहार,रूमानी अनुभूतियों की अनुपम छटा बिखेर रहा है।वहीं दूसरी ओर -भूख से व्याकुल शिशुओं का आर्त्त-नाद,अन्यायऔर अत्याचार का तांड़व,साम्प्रदायिक भेद-भाव द्वारा उपजती नफरत,दूषित मानसिकता,सामाजिक व्यवस्था की दुरूह विषमतायें साथ ही जीवन की आधारभूत समस्याओं की अनसुलझी स्थितियां विकराल रूप में प्रदर्शित हो रहीं हैं।कुछ गीतिकाओं में कवियों ने सामाजिक दायित्व का निर्वहन करते हुए ऐसे अनुत्तरित प्रश्न उठाये हैं जिनका दूर-दूर तक कोई समाधान नहीं दिखाई पड़ता।
     अपने राष्ट्र और संस्कृति के प्रति प्रेम रखने वाले कतिपय कवियों ने देश की बिगड़ती स्थिति, भ्रष्ट -व्यवस्था, दूषित राजनीति,विदेशी सभ्यता की अंधाधुंध नकल पर  भी कलम उठाई है।
     प्रेम, सौंदर्य, राष्ट्रऔर संस्कृति के अतिरिक्त जीवन-दर्शन पर भी गम्भीर विचारों का पल्लवन रचनाओं में स्थान पा सका है।भाग्य,नियति,ईश्वर ,लोक-परलोक की बातों  के साथ कवि मात-पिता की सेवा द्वारा मोक्ष की कामना करते हुए मानव -जीवन की सार्थकता का सुन्दर संदेश प्रेषित कर रहे हैं।
     लौकिक प्रेम कीअवहेलना कर अलौकिक प्रेम के माध्यम सेआध्यात्म की उंचाइयों तक पहुँचने का सफल प्रयास कवियों की रचनाधर्मिता का आधार बना है।
     कहने का अभिप्राय है कि गीतिकाओं के इस महासंगम में कवियों ने मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं को पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ वाणी देने का सफल प्रयास किया है।
   भावनाओं के इन्द्रधनुषी रंगों केसाथ निष्पक्ष,स्वच्छ तथा मर्यादित विचार-धारा का संवहन करने वाली यह महान कृति अपने समग्ररूप में एक अनूठा संग्रह है।
         संक्षेप में बस इतना कहना चाहूँगी -परम श्रध्येय-श्री ओम नीरव जी ने 'गीतिकालोक' केरूप में सुधी पाठकों को एक ऐसी सम्पूर्ण जीवन गाथा रूपी निधि प्रदान की है,जिसमें बुद्धि नियम निर्धारित करती है,भाव सजते-सँवरते,ठुनकते-मचलते,उल्लसित होते निराश होते,तपते,दहकते,आक्रोशित होते हैं।कभी-कभी ज्वालामुखी बन कर फूटभी पड़ते हैं और अंत में सांसारिक माया-मोह से विरक्त होकर उस परम-तत्व की शरण की कामना करते हुए दर्शन की उंचाइयों तक पहुँच जाते हैं।
         आद० श्री ओम नीरव जी का यह अभिनव, स्तुत्य प्रयोग अपनी भरपूर सार्थकता के साथ साहित्य जगत में अवश्य ही 'मील का पत्थर' साबित होगा,मुझे पूर्ण विश्वास है। ' गीतिकालोक' की आशातीत सफलता की मंगल-कामना के साथ गुरुवर को मेरा शतश: नमन।
    
डॉ० मंजु लता श्रीवास्तव
एसोसिएट प्रोफेसर
डी एस एन पी जी महाविद्यालय
उन्नाव उ०प्र०
निवास-कानपुर-9161999400