रविवार, 15 मई 2016

गीतिकालोक- नव्यता के साथ प्राचीन छंदों का गहन चिंतन शोधक ग्रन्थ

डॉ० मंजु लता श्रीवास्तव
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               हिंदी काव्य में छंद- शास्त्र के मूर्धन्य विद्वान 'गीतिकालोक' के प्रणेता आदरणीय श्री ओम नीरव जी का साहित्य जगत में एक विशिष्ट स्थान है। उनके द्वारा लिखित एवं सम्पादित इस महाग्रंथ में लेखक के गहन-चिन्तन, गम्भीर विचार-सरणि,संयमित भाषा-शैली और बोधगम्यता के आधार पर काव्य जगत में 'गीतिकालोक' को एक अति श्रेष्ठ रचना के रूप मे जाना जा सकता है।
             'गीतिकालोक'  नाम सुनते ही कल्पना मेंं एक ऐसा संसार दृश्यमान होने लगता है जिसके विशाल फलक में कोमल भावना,उत्तम विचार और उत्कट जिज्ञासा अनायास ही उभरने लगती है।
        साहित्य की किसी भी विधा में सौंदर्य तभी उत्पन्न होता है जब साहित्य कार चितेरा बनकर रचना को विभिन्न सौंदर्य उपकरणों द्वारा सजाता और सँवारता है। कवि-हृदय की प्रबल अनुभूतियों को साहित्यिक अभिव्यक्ति देने के लिये किसी विशिष्ट विधा का आश्रय लेना पड़ता है।इसके लिए कभी-कभी किसी विद्वान गुरु का मार्ग दर्शन भी आवश्यक होता है।
     शिल्प-विधान के क्षेत्र में विशेष रूप से हिन्दी छंद के विषय में बहुत अधिक भ्राँन्तियाँ फैली हैं जिनको वैज्ञानिक  आधार पर निर्मूल करने का दुष्साध्य कार्य श्री ओम नीरव जी ने किया है।पारम्परिक उर्दू गज़ल में जब हिन्दी भाषा के शब्दों का बहुतायत में प्रयोग होने लगा तो समालोचकों ने उसे एक नया नाम दे दिया।जिसे आज गीतिका के रूप में सम्मान प्राप्त है।हिन्दी के प्रति प्रेम और रुझान को संपोषित करने वाली यह अनु शासित विधा काव्य जगत में नवीन संभावनों के द्वार खोलेगी-ऐसी आशा करनी चाहिए ।
         आद० नीरव जी ने इस इस विधा पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता का अनुभव कियाऔर इस पर अध्ययन तथा मार्ग-दर्शन का कार्य प्रारम्भ कर दिया।उनके द्वारा सुझाई गई इस विधा से आकर्षित होकर अनेक कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से इसका प्रचार और प्रसार किया।अंतत: यह विधा इतनी लोकप्रिय हो गई कि इसने कविता के प्राँगण में धूम मचा दी।
    विवेच्य ग्रंथ को दो भागों में विभाजित किया गया है।प्रथम भाग में विधा का स्वरूप एवं विशेषतायें तथा उसका व्याकरणिक विवेचन अत्यंत सरल सुबोध भाषा में वैज्ञानिक ढ़ग से प्रस्तुत किया गया है। लेखक ने विभिन्न उदाहरणों (अनेक कवियों की रचनाओं) द्वारा विषय की दुरूहता को सरलतम बनाकर जिज्ञासु कवियों का मार्ग प्रशस्त किया है।
        गीतिका में 'लय 'का निर्धारण करने के लिए ' मापनी'और 'छंद' को आधार माना है।मात्रिक और वर्णिक दोनों प्रकार के छंदों को 'मापनीयुक्त' तथा 'मापनीमुक्त' की सीमा में बाँधकर एक अभिनव प्रयोग आद०नीरव जी की मौलिक प्रतिभा का परिचायक है। इस संबन्ध में उन्होने स्वयं लिखा है--" वस्तुत: गीतिका एक ऐसी गज़ल है जिसमें हिंदी भाषा की प्रधानता हो,हिंदी व्याकरण की अनिवार्यता होऔर पारस्परिक मापनियों के साथ हिंदी छंदों का समादर हो।"
         पुस्तक के उत्तरार्ध्य में विभिन्न ख्यातिप्राप्त कवियों की उत्कृष्ट रचनाओं का संकलन है।इसमें सत्तासी गीतिकाकारों की एक सौ इक्कीस रचनाओं को उनके शिल्प विधान के साथ सुशोभित किया गया है।
        कवि-हृदय की दरलीज पर खड़ी वेदना जब बाहर निकलने को विकल होने लगती है तो संवेदनायें शब्दों का जामा पहन कर काव्य की किसी भी विधा में आकार ग्रहण करने लगतीं हैं।लेखक के हृदय की विकल भावना पाठक की सह-अनुभूति पाकर प्रवाहित होती हुई आनन्द सागर में निमग्न हो जाती है।ऐसी ही कोमल -कठोर,उर्जसित-शान्त अनुभूतियों का वृहत-कोष 'गीतिकालोक' अनेक श्रेष्ठ रचनाकारों की सबल लेखनी का लेखा-जोखा है।जिसके माध्यम से कविगण सामाजिक चेतना को झझकोरता हुआ समाज की विसंगत स्थिति पर विचार करने के लिये प्रेरित कर रहा है ।ग्रंथ में कवियों की व्यक्तिगत पीड़ा सामाजिक स्तर पर आकर सम्पूर्ण मानव मन का प्रतिनिधित्व कर रही है।
      प्रस्तुत गीतिकाओं में यदि एक ओर प्रेमऔर सौंदर्य अपने पूर्ण यौवन पर है-जैसे-मतवाले रूप का मनुहार,महकते फूलों का श्रृंगार,प्रीति की बाँसुरी की रसीली तान,सपनों का मदभरा संसारऔर प्रिय की बाँहों का गलहार,रूमानी अनुभूतियों की अनुपम छटा बिखेर रहा है।वहीं दूसरी ओर -भूख से व्याकुल शिशुओं का आर्त्त-नाद,अन्यायऔर अत्याचार का तांड़व,साम्प्रदायिक भेद-भाव द्वारा उपजती नफरत,दूषित मानसिकता,सामाजिक व्यवस्था की दुरूह विषमतायें साथ ही जीवन की आधारभूत समस्याओं की अनसुलझी स्थितियां विकराल रूप में प्रदर्शित हो रहीं हैं।कुछ गीतिकाओं में कवियों ने सामाजिक दायित्व का निर्वहन करते हुए ऐसे अनुत्तरित प्रश्न उठाये हैं जिनका दूर-दूर तक कोई समाधान नहीं दिखाई पड़ता।
     अपने राष्ट्र और संस्कृति के प्रति प्रेम रखने वाले कतिपय कवियों ने देश की बिगड़ती स्थिति, भ्रष्ट -व्यवस्था, दूषित राजनीति,विदेशी सभ्यता की अंधाधुंध नकल पर  भी कलम उठाई है।
     प्रेम, सौंदर्य, राष्ट्रऔर संस्कृति के अतिरिक्त जीवन-दर्शन पर भी गम्भीर विचारों का पल्लवन रचनाओं में स्थान पा सका है।भाग्य,नियति,ईश्वर ,लोक-परलोक की बातों  के साथ कवि मात-पिता की सेवा द्वारा मोक्ष की कामना करते हुए मानव -जीवन की सार्थकता का सुन्दर संदेश प्रेषित कर रहे हैं।
     लौकिक प्रेम कीअवहेलना कर अलौकिक प्रेम के माध्यम सेआध्यात्म की उंचाइयों तक पहुँचने का सफल प्रयास कवियों की रचनाधर्मिता का आधार बना है।
     कहने का अभिप्राय है कि गीतिकाओं के इस महासंगम में कवियों ने मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं को पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ वाणी देने का सफल प्रयास किया है।
   भावनाओं के इन्द्रधनुषी रंगों केसाथ निष्पक्ष,स्वच्छ तथा मर्यादित विचार-धारा का संवहन करने वाली यह महान कृति अपने समग्ररूप में एक अनूठा संग्रह है।
         संक्षेप में बस इतना कहना चाहूँगी -परम श्रध्येय-श्री ओम नीरव जी ने 'गीतिकालोक' केरूप में सुधी पाठकों को एक ऐसी सम्पूर्ण जीवन गाथा रूपी निधि प्रदान की है,जिसमें बुद्धि नियम निर्धारित करती है,भाव सजते-सँवरते,ठुनकते-मचलते,उल्लसित होते निराश होते,तपते,दहकते,आक्रोशित होते हैं।कभी-कभी ज्वालामुखी बन कर फूटभी पड़ते हैं और अंत में सांसारिक माया-मोह से विरक्त होकर उस परम-तत्व की शरण की कामना करते हुए दर्शन की उंचाइयों तक पहुँच जाते हैं।
         आद० श्री ओम नीरव जी का यह अभिनव, स्तुत्य प्रयोग अपनी भरपूर सार्थकता के साथ साहित्य जगत में अवश्य ही 'मील का पत्थर' साबित होगा,मुझे पूर्ण विश्वास है। ' गीतिकालोक' की आशातीत सफलता की मंगल-कामना के साथ गुरुवर को मेरा शतश: नमन।
    
डॉ० मंजु लता श्रीवास्तव
एसोसिएट प्रोफेसर
डी एस एन पी जी महाविद्यालय
उन्नाव उ०प्र०
निवास-कानपुर-9161999400