ओम नीरव

सोमवार, 21 मार्च 2016

कुलदीप बृजवासी की गीतिका

समीक्षा समारोह -101
विधा
-- गीतिका 
मापनी-- 2122 2122 2122 212
समान्त-- आती
पदान्त-- तो है
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मूढ हूँ नादान हूँ लेकिन कलम भाती तो' है
लेखनी के पथ खडा जयश्री नजर पाती तो' है.
है कहावत पूर्वजों की याद अब आती मुझे
नाव जर्जर ही सही लहरों से टकराती तो है
आज तक लिखता रहा अन्याय और मैं बेबसी
कर चुका हूँ एक गलती अब समझ आती तो है
काश मैं भी हास्य के ही चुटकुले दो चार कहता
मर गया उस्ताद बेशक याद रख नाती तो' है
सच सदा हर रोज कहना जिन्दगी भर याद रख
हो भले ही हार लेकिन जीत दिखलाती तो' है
रो रही है अब गजल उर्दू से' हिन्दी हो गई
द्वेष की अब भावनाएँ आज अपनाती तो' है
हैं बहुत मजबूरियाँ कुलदीप कवितापाठ में
द्रोपदी के चीर में सब लाज भी जाती तो' है

                 ------कुलदीप बृजवासी