रविवार, 4 दिसंबर 2016

कवितालोक लखनऊ द्वारा आयोजित कार्यशाला का भव्य आयोजन सम्पन्न

कवितालोक लखनऊ की आठवीं कार्यशाला का आयोजन ओम-कुटीर के सभागार में ओम नीरव के संयोजन में सम्पन्न हुआ। आयोजन के अध्यक्ष डॉ अजय प्रसून जी, मुख्य अतिथि डॉ उमेश चन्द्र श्रीवास्तव जी और विशिष्ट अतिथि आभा मिश्रा जी एवं हरि प्रसाद मिश्र ’असीम’ जी की सारस्वत उपस्थिति में कार्यशाला का सफल संचालन राहुल द्विवेदी ‘स्मित’ जी ने किया। इस अवसर पर कवितालोक-अध्यक्ष ओम नीरव ने हिन्दी साहित्य के सृजन-संवर्धन के लिए महिला उत्थान मंच की संयोजक आभा मिश्रा जी को ‘कवितालोक रत्न’ सम्मान और विपिन मलिहाबादी जी को ‘गीतिका रत्न’ सम्मान से विभूषित किया। काव्यपाठ से पहले गीतिका विधा के आधार छंदों के रूप में विधाता, लावणी, स्रग्विणी, गंगोदक, पदपादाकुलक, चौपाई, गीतिका, मुनिशेखर, हरिगीतिका आदि छंदों पर चर्चा हुई जिसमें गौरी शंकर वैश्य जी, शशि सौरभ जी, डॉ अजय प्रसून जी और राहुल द्विवेदी ‘स्मित’ की भूमिका उल्लेखनीय रही। उस बीच प्रसून जी द्वारा प्रस्तुत अनागत गीतिका की परिकल्पना का विशेष स्वागत हुआ।
आभा मिश्रा जी की सुमधुर वाणी वंदना से प्रारम्भ इस काव्य आयोजन में मानवीय मूल्यों की गिरावट को सौरभ ‘शशि’ जी ने कुछ इस प्रकार व्यक्त किया -
हाड़ मांस से अब कहाँ बनते हैं इंसान,
ममता का संसार में शेष नहीं सम्मान।
मंजुल मंज़र लखनवी जी ने तालियों की गड़गड़ाहट के बीच ये पंक्तियाँ सुनाईं -
जो सोचा नहीं था यहाँ हो रहा है,
खुदाया ये कैसा जहां हो रहा है।
ये किसने जलाए मोहब्बत के रिश्ते,
अजब सा कसैला धुआँ हो रहा है।
मनु वाजपेयी जी ने माँ की ममता को इसप्रकार अभिव्यक्ति देकर श्रोताओं की सराहना प्राप्त की -
बिना वजहों के वह जो माँ का अक्सर मुकराना था,
असल में दर्द को मुझसे छुपाने का बहाना था।
मुकेश कुमार मिश्र की पंक्तियाँ श्रोताओं के हृदय को स्पर्श कर गईं -
भ्रष्ट बढ़ते ही गए सब हो गया लाचार मैं,
भूख का मारा हुआ हूँ क्या लिखूँ शृंगार मैं।
विपिन मलिहाबादी जी कहते सुने गए -
हजारों दिवाने हुए कैसे तेरे,
बताकर हमें अपना कायल बना ले।
राहुल द्विवेदी ‘स्मित’ जी गीतिका विधा में वाणी वंदना सुनाकर श्रोताओं को मुग्ध कर लिया -
श्वेत वसना मेरे कंठ में आ बसो गीत छंदों में तुमको ही गाता रहूँ,
भक्तिमय छंद रचता रहूँ रातदिन, भाव पुष्पों से तुमको रिझाता रहूँ।
मिज़ाज लखनवी जी की इन पंक्तियों ने लोगों के दिलों पर गहरा असर किया -
क्या भरोसा कि सहर देख लूँ मैं भी कल की,
दो घड़ी के लिए ही अपना बना ले मुझको।
लघु मापनी में निबद्ध गीतिका सुनाते हुए गौरी शंकर वैश्य ‘विनम्र’ जी ने इन पंक्तियों पर भरपूर तालियाँ प्राप्त कीं -
उच्च अट्टालिका पड़ी सूनी,
कर्मशिल्पी मकान को तरसे।
डॉ उमेश श्रीवास्तव जी ओज पूर्ण रचना को बहुत वहवाही मिली, उनकी पंक्तियाँ -
धरती पुलकित हो उठे आज जन-जन का दुख हराना होगा,
इस कर्मभूमि में असुरों से फिर धर्म युद्ध करना होगा।
शरद पाण्डेय ‘शशांक’ जी ने धाराप्रवाह छंदों के साथ गीतिका भी सुनाई जिसकी इन पंक्तियों को बहुत पसंद किया गया -
तुम्हारे लिए मैं ग़ज़ल लिख रहा हूँ,
नयन हो रहे हैं सजल लिख रहा हूँ।
घनाक्षरी छंदों की छटा बिखेरते हुए अशोक शुक्ल ‘अनजान’ ने कहा -
बार बार जिसने किया है संकटों से पार,
आज आप उसका किनारा बन जाइए।
कवयित्री माधवी मिश्रा ने अपनी रचना में सम्मोहक प्रतीक विधान प्रस्तुत किया -
बहुत टिमटिमाते दिये रह लिये, मौन हो शौर्य के सब खजाने भरे,
आग से आग की बात होती रही, हम यूँ ही जल रहे रोशनी से परे।
हरि प्रसाद मिश्र ‘असीम’ जी की इन भावभरी पंक्तियों पर श्रोता वाह-वाह कर उठे -
जग जाते जब जज़्बात अच्छा लगता है,
तपन बढ़े और हो जाये बरसात अच्छा लगता है।
कवयित्री शोभा मिश्रा जी ने करुण रस प्रधान गीत सुनाकर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया -
आँसू बोलो क्या सोच के तुम इन आँखों में आ जाते हो,
प्रतिफल जो हँसते आढ़त मेरे उनमें पीड़ा भर जाते हो।
अध्यक्षीय काव्य पाठ करते हुए डॉ अजय प्रसून जी ने उत्कृष्ट गीत सुनाकर लोगों का मन मोह लिया और फिर गीतिका विधा पर गीतिका प्रस्तुत करते हुए कहा -
गीतिका कितनी सुंदर लगे,
भावनाओं भरा घर लगे।
संतुलित मापनी में सजी,
जैसे सुरखाब के पर लगे।
काव्यशाला के समापन पर अभ्यागतों का कृतज्ञताज्ञापन करते हुए संयोजक ओम नीरव जी ने घोषणा की कि प्रति माह कवितालोक द्वारा एक काव्यशाला और एक गीतिका-समारोह का आयोजन किया जाएगा जिसका स्थान और समय आयोजन से पूर्व सूचित कर दिया जायेगा।