ओम नीरव

रविवार, 1 जनवरी 2017

कवितालोक सृजन संस्थान लखनऊ के षष्ठम गीतिका समारोह का आयोजन

संध्या जी को गीतिका रत्न व निवेदिता जी को कवितालोक रत्न
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कवितालोक सृजन संस्थान के छठे गीतिका समारोह का आयोजन ओम कुटीर
पर प्रख्यात नवगीतकार मधुकर अष्ठाना जी की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। ओम नीरव के संयोजन और राहुल द्विवेदी स्मित जी के संचालन में सम्पन्न इस समारोह में मुख्य अतिथि प्रख्यात गीतकार शिवभजन कमलेश जी और विशिष्ट अतिथि केदार नाथ शुक्ल जी ने मंच को गरिमा प्रदान की। इस अवसर पर हिन्दी भाषा का गौरव बढ़ाने वाली गीतिका-विधा के सृजन-संवर्धन के लिए कवयित्री संध्या सिंह जी को 'गीतिका रत्न' से और हिन्दी कविता के संवर्धन में विशिष्ट योगदान के लिए कवयित्री निवेदिता श्रीवास्तव जी को 'कवितालोक रत्न' से सम्मानित किया गया। शिवभजन  कमलेश जी की सुमधुर वाणी वंदना से प्रारम्भ हुए काव्य पाठ के क्रम में ब्रजेश नीरज जी ने सुमेरु छंद पर आधारित गीतिका के युग्मों पर श्रोताओं की भरपूर तालियाँ प्राप्त कीं -
खुशी है गाँव अपने जा रहा हूँ।
महक मिट्टी की सोंधी पा रहा हूँ।
मचानों पर जो मैंने चढ़ के देखा,
हिमालय को भी छोटा पा रहा हूँ।
संध्या सिंह जी ने मापनी गालगागा गालगागा गालगागा पर आधारित गीतिका  सुनाकर सभी को सम्मोहित कर दिया, उनकी गीतिका के मुखड़ा और युग्म -
छोड़ अपना घर सदा बाहर फिरा है।
मन भला कब देह के भीतर पला है।
तुम जिसे मंज़िल समझ कर जी रहे हो,
वह पड़ाओं का महज एक सिलसिला है।
राहुल द्विवेदी जी ने गीतिका छंद पर आधारित गीतिका में गीतिका विधा की विशिष्टता को व्यक्त कर श्रोताओं को मुग्ध कर लिया -
पुष्प सुरभित सुगंधित विधा गीतिका,
लो चली हो व्यवस्थित विधा गीतिका।
ओम नीरव जी ने नव वर्ष के स्वागत में लावणी छंद पर आधारित गीतिका सुनाते हुए कहा-
फसलें आज गयीं जो बोयी, वे कल को लहराएंगी।
सोलह की गदरायी कलियाँ, सत्रह में खिल जाएंगी।
घोर अभावों के घर पलकर, राजा रंक बना कोई, 
आँसू के घर-आँगन को अब, मुसकाने महकाएंगी।
इसी क्रम में मन मोहन बाराकोटी 'तमाचा लखनवी' जी ने अपनी पंक्तियों से ओज का संचार कर दिया -
निज पर सदा भरोसा रखना, अपने मन में धीर धर,
आगे बढ़ते रहो साथियों, तुम लहरों को चीर कर।
राम शंकर वर्मा जी ने गीत 'आ गए हैं ढोलकों की थाप वाले दिन' सुनाकर वाहवाही लूटी तो केदार नाथ शुक्ल जी ने सरसी छंद में ढली इन पंक्तियो पर भरपूर प्रशंसा प्राप्त की-
काशी की है सुबह सिसकती और अवध की शाम,
तम्बू नीचे खड़े विदाई देते हैं श्रीराम।
केवल प्रसाद सत्यम जी ने ग्राम्य जीवन की त्रासदी को कुछ इसप्रकार शब्दायित किया-
गावों की उस महक को, कैसे रखते साथ,
बिके बैल, वन, बाग सब, मिट्टी हुई अनाथ।
कवयित्री निवेदिता श्रीवास्तव जी ने स्वस्तिवाचन को सुंदरता से शब्दायित किय। प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा जी ने नव वर्ष की रहस्यात्मक अनुभूति को कुछ इसप्रकार शब्द दिये-
विगत आगत मध्य जीवन चक्र चल रहा,
खिले पुष्प से द्वार पर करते हम वंदन।
महेश प्रसाद अष्ठाना जी ने युग के पथिक को इन शब्दों में प्राण ऊर्जा प्रदान की-
कभी थको मत, कभी रुको मत, कभी न बैठो हार कर, 
लड़ना होगा, लड़ना होगा, तूफानों को पार कर।
शिवभजन कमलेश जी ने गीतों की सलिला प्रवाहित करने के साथ नए साल के स्वागत में प्रस्तुत मनहर घनाक्षरी छंद की इन पंक्तियों पर श्रोताओं को वाह-वाह करने को विवश कर दिया-
राम करे अन्न जल का कहीं न हो अभाव,
और कहीं भी अकाल मृत्यु का न फेरा हो।
प्रेम और ज्ञान का हो संचरण कमलेश,
नित्य नए रंग में उमंग का सवेरा हो।
अध्यक्षीय काव्य पाठ करते हुए मधुकर अष्ठाना जी उत्कृष्ट बिम्ब यूजनाओं से युक्त नव गीतों के प्रस्तुतीकरण से सभी को भाव विभोर कर दिया, उनकी इन  पंक्तियों पर श्रोता झूम उठे-
सपने ही देखते रहे हम, और उमर आ गयी किनारे,
टूट गया जब अपनों का भ्रम, रहे भंवर में बिना सहारे।
अंत में समाजसेवी शिक्षक रवि कान्त मिश्र जी ने सभी आगंतुकों का आभार व्यक्त किया।
             -:कवितालोक:-