ओम नीरव

बुधवार, 19 अक्तूबर 2016

राष्ट्रीय पुस्तक मेला में गीतिकालोक-परिचर्चा

"गीतिकालोक"
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            ओम नीरव प्रणीत 'गीतिका' विधा के लक्षण ग्रंथ 'गीतिकालोक' पर एक परिचर्चा का आयोजन मोतीमहल वाटिका लखनऊ में चल रहे राष्ट्रीय पुस्तक मेला 'गागर में सागर' के साहित्यिक मंच पर किया गया। इस आयोजन 'गीतिकालोक-परिचर्चा' की अध्यक्षता लखनऊ विश्वविद्यालय के भाषाविज्ञान विभाग की पूर्व अध्यक्ष  प्रो डॉ उषा सिन्हा जी ने की तथा मुख्य अतिथि लखनऊ विश्वविद्यालय के काव्यशास्त्र विभाग के आचार्य प्रो डॉ हरी शंकर मिश्र जी थे। परिचर्चा से पूर्व सभी आमंत्रित समीक्षकों को कृतिकार ओम नीरव ने शाल उढ़ाकर और सम्मान पत्र भेंट कर 'गीतिका रत्न' मानद उपाधि से सम्मानित किया। इस भव्य आयोजन के पूर्व घोषित अध्यक्ष मा. उदय प्रताप सिंह कार्यकारी अध्यक्ष उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान अपरिहार्य कारणवश नहीं आ सके।
           परिचर्चा का विषय-प्रवर्तन करते हुए छंदाचार्य रामदेव लाल 'विभोर' ने कृति को गीतिका-विधा के लक्षण ग्रंथ के रूप में स्वीकार करते हुए कहा कि गीतिका वास्तव में ग़ज़ल से जन्मी है किन्तु यह ग़ज़ल से भिन्न हैं और नीरव जी ने इसे एक स्वतंत्र हिन्दी काव्य विधा के रूप में स्थापित किया है। विभोर जी ने यह भी स्पष्ट किया किया कि कृति में छंदों का मापनी के आधार पर वर्गीकरण एक नयी और बहुत  उपयोगी परिकल्पना है।
          वरिष्ठ समीक्षक एवं दार्शनिक डॉ अनिल मिश्र ने कृति गीतिकालोक के अध्यायों की काव्यशास्त्रीय विवेचना करते हुए कहा कि गीतिका के प्रणयन से हिन्दी कविता को एक बड़ा विस्तार मिला है और लेखनी हिन्दी छंदों का सशक्त व्यापक धरातल प्राप्त हुआ है।
           मासिक पत्रिका 'ब्रज कुमुदेश' के संपादक वरिष्ठ छंदकार अशोक कुमार पाण्डेय 'अशोक' ने कृति में प्रतिपादित 'मापनी-विज्ञान' उदाहरण सहित विवेचना करते हुए बताया कि मापनियों के आधार पर छंदों की व्याख्या और मापनियों के निर्माण का सिद्धान्त नीरव जी की मौलिक एवं उपयोगी खोज है। अशोक जी ने कृति में संकलित रचनाओं के साथ उनके शिल्प के उल्लेख को एक अभूतपूर्व कार्य बताया और वर्णिक स्रग्विणी पर आधारित शिव नारायण यादव सारथी की रचना की विशेष सराहना की।
            वरिष्ठ नवगीतकार समीक्षक मधुकर अष्ठाना जी ने कृति में वर्णित गीतिका की सभी तत्वों की विवेचना करते हुए कहा गीतिका विधा के उद्भव से उर्दू न जानने वाले हिन्दी भाषी रचनाकारों में आत्मसम्मान की भावना का संचार हुआ है और इसीलिए गीतिका का सृजन त्वरित गति से आगे बढ़ चला है। आपने चन्द्र सेन विराट सहित अनेक रचनाकारों का उल्लेख किया जो स्वतंत्र रूप से गीतिकाओं का उत्कृष्ट सृजन कर रहे हैं।
                मुख्य अतिथि डॉ हरि शंकर मिश्र जी ने गीतिका की ग़ज़ल से भिन्नता को रेखांकित करते हुए कहा कि हिन्दी भाषा की प्रधानता, हिन्दी व्याकरण की अनिवार्यता और हिन्दी छंदों पर आधारित लय की विशिष्टता - यह तीन तत्व ऐसे हैं जो गीतिका को एक अलग पहचान देते हैं। आपने बताया कि अभी तक ग़ज़ल को हिन्दी काव्य शास्त्र में सम्मिलित करने में कठिनाई का सामना करना पद रहा था किन्तु गीतिका के लिए यह कार्य बहुत सुगम हो गया है। आपने आश्वासन दिया कि वे गीतिका-विधा को विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में सम्मिलित कराने का भरसक प्रयास करेंगे।
          अंत में अध्यक्ष डॉ उषा सिन्हा ने गीतिका विधा के पल्लवन में कृतिकार नीरव की वैज्ञानिक दृष्टि, समन्वयवादी वृत्ति और अनुशासनप्रियता को रेखांकित करते हुए कहा कि गीतिकालोक कृति में गीतिका विधा का परिचय देने के साथ उसकी सांगोपांग विस्तृत व्याखाया की गयी है जो भाषा विज्ञान और छंद शास्त्र दोनों की कसौटी पर खरी उतरती है। आपने नीरव जी के रचे कई छंदों को सुनाया जिनमें गीतिका के मर्म को स्पष्ट किया गया है।
       इस अवसर पर सुल्तानपुर से पधारे अवनीश त्रिपाठी जी और इटौंजा से पधारे राहुल द्विवेदी स्मित जी ने गीतिका विधा पर गीतिका सुनाकर श्रोताओं मन मुग्ध कर लिया।        आयोजन की व्यवस्था में डॉ अजय प्रसून जी, उमाकांत पांडेय जी, हरीश चन्द्र लोहुमी जी, सुनील त्रिपाठी जी, श्याम फतनपुरी जी की भूमिका विशेष सराहनीय रही।
         समारोह में नगर के साहित्यकारों ने बड़ी संख्या में उपस्थित होकर मंच का उर्साहवर्धन किया जिनमें कवि कमलेश मौर्य मृदु जी, राजाभैया गुप्ता जी, पद्मकान्त शर्मा प्रभात जी, सर्वेश अस्थाना जी, केदार नाथ शुक्ल जी, प्रदीप कुशवाहा जी, के.के.श्रीवास्तव जी, सहबदीन जी, केवल प्रसाद जी, संध्या सिंह जी, निवेदिता श्रीवास्तव जी, मनोज शुक्ल जी, अशोक अनजान जी, अनिल बाँके जी, आभा खरे जी, संध्या सिंह जी आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं।