ओम नीरव

शनिवार, 26 नवंबर 2016

पीरनगर (सीतापुर) में कवितालोक विराट कविसम्मेलन


     'कवितालोक सृजन संस्थान' के तत्वावधान में एक 'विराट कवि सम्मेलन' का आयोजन 24 नवम्बर 2016 गुरुवार को पीरनगर, सीतापुर में 'श्री साठिका देवी मंदिर यज्ञ संचालक समिति' के सौजन्य से ओम नीरव के संरक्षण एवं सुनील त्रिपाठी के संयोजन में किया गया। आयोजन की अध्यक्षता ओम नीरव ने की और संचालन जाने माने मंच संचालक आशुकवि कमलेश मौर्य मृदु ने किया। मुख्य अतिथि के रूप में बम्हेरा निवासी सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य रमेशचन्द्र पान्डेय और विशिष्ट अतिथि के रूप में शुभांजलि प्रकाशन कानपुर के प्रबन्धक  डाॅ. सुभाष चन्द्रा उपस्थित रहे। कार्यक्रम का प्रारम्भ सिधौली सीतापुर के युवाकवि और मंचों के प्रसिद्द कवि लवकुश दीक्षित के प्रपौत्र वंश दीक्षित की सुमधुर वाणी वंदना से हुआ। इस अवसर पर पधारे हुए कवियों को हिन्दी साहित्य के संवर्धन में अप्रतिम योगदान के लिए शाल उढ़ाकर और सम्मान पत्र देकर कवितालोक द्वारा 'काव्य रत्न' सारस्वत सम्मान से विभूषित किया गया तथा ओम नीरव को श्री साठिका देवी यग्य संचालक समिति द्वारा काव्य विभूषण सम्मान से अलंकृत किया गया ।
          इस अवसर पर कवियों ने छंद, मुक्तक, गीत, गीतिका, ग़ज़ल, व्यंग्य आदि के द्वारा श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर लिया । रात्रि की तीसरे पहर तक अनवरत चलने वाले इस कार्यक्रम में काव्यपाठ करते हुए:------
       मनकापुर, गोंडा से पधारे गीतों के युवराज धीरज श्रीवास्तव ने भावभरी उत्कृष्ट रचनाएँ सुनाकर श्रोताओं का मन मुग्ध कर लिया। उनकी पंक्तियाँ -
' साँझ जब आँसू बहाये, बैठ दिल के द्वार पर ।
क्या भरोसा भोर का फिर, क्या तुम्हारे प्यार पर ।।'
        पीलीभीत से पधारे गीतकार संजीव मिश्र ने भारत की बेटियों पर रचना सुनाकर श्रोताकर को भावविभोर कर दिया -
धूप हो या छाँव हो पर मुस्कराती बेटियाँ,
आंधीयों में भी चरागों को जलाती बेटियाँ।
         सिधौली से पधारे वंश दीक्षित ने राष्ट्रीय गीत सुनाकर श्रोताओं में राष्ट्रीय भावना का संचार किया-
तिरंगे तेरा रूप महान।
तीन रंग में रंगा हुआ है पूरा हिंदुस्तान।
           नोटों की तत्कालीन समस्या पर लखीमपुर से आए अवधी कवि ज्ञान प्रकाश आकुल  की रचना का श्रीताओं ने जोरदार तालियों से स्वागत किया-
का सारा धन बाहर आई बड़कई तिजोरी ग्वाटन का,
सब भड़भड़ु मचिएगा न्वाटन का। 
      बाराबंकी से आये डॉ. सर्मेश शर्मा ने अपनी रचनाओं से भरपूर तालियाँ बटोरीं-
'सदा सौहार्द की सम्वेदनाएँ लेके चलते हैं ,
प्रफुल्लित हों सभी ऐसी फिजायें लेके चलते हैं ।' 
        लखनऊ से पधारे आशुकवि कमलेश मौर्य 'मृदु' ने हिंदी छंदों का मान बढ़ाती इन पंक्तियों को पढ़कर सभी को अपना प्रशंसक बना लिया-
'सत्तर वर्ष नागपंचमी मनाते बीते,
अब नागयज्ञ पर विमर्श होना चाहिए ।
पाक बांग्ला ढाका इस्लामाबाद तक
अखण्ड भारत वर्ष होना चाहिए ।।'
      सुलतानपुर से पधारे अवनीश त्रिपाठी की गीतिका पर श्रोता झूम उठे, उनकी गीतिका का युग्म -
'धुंध की चादर लपेटे धूप अलसाई हुई,
बात लेकिन हो रही है ताप के विस्तार की ।'
       लखनऊ से आये उमाकान्त पांडेय ने राष्ट्रीय भावना की रचना पढ़कर श्रोताओं की प्रशंसा प्राप्त की -
'रक्त की प्रत्येक बूँद तुमको चढ़ायें तो भी,
रहेंगे तुम्हारे कर्जदार वन्देमातरम ।
अन्न जल जिसने छुआ है माँ भारती का,
उसे कहना पड़ेगा बार-बार वन्देमातरम ।।'
     संयोजक सुनील त्रिपाठी की ओजपूर्ण प्रस्तुति सुनकर श्रोता रोमांचित हो उठे-
'याचना अब नहीं सिर्फ रण चाहिये ,
घात-प्रतिघात प्रत्याक्रमण चाहिये ।'
         लखनऊ के राहुल द्विवेदी 'स्मित' की इन पंक्तियों पर भरपूर तालियाँ मिलीं-
'तिनका तिनका बिखर रहा है यह प्यारा संसार ।
जाने किसने बना दिया है रिश्तों की ब्यापार ।।'
          पीलीभीत से पधारे संजीव मिश्र के गीत की पंक्तियाँ सभी की आँखों को पसीज गयीं -
'गुमसुम बच्चों के सँग बैठी लेकर पूजा की थाली ।
दीप जलाऊँ फिर भी तुम बिन लगती सूनी दीवाली ।।'
      लखनऊ के हरीश लोहुमी ने प्रभावशाली शब्दों में सुनाया -
'बात टाली गयी दिवाली में, रात खाली गयी दिवाली में ।
कुछ वजह थी तभी तो थोड़ी सी, फिर मँगा ली गयी दिवाली में ।'
       लखनऊ से पधारे ग़ज़लकार मंजुल मंजर लखनवी ने सम्पूर्ण जन मानस का आह्वान करते हुए कहा -
'हमारी आने वाली पीढ़ियों को गर बचाना है ,
तो आओ रोक लें मिलकर ये जहरीली हवाएँ हम ।'
          सीतापुर से आये केदार नाथ शुक्ला ने देश के जवानों का गौरव गान करती हुई रचनाएँ सुनाकर श्रोताओं का हृदय जीत लिया, उनकी पंक्तियाँ -
'सेज सुमनों की सजाकर खार पर सोती जवानी है ।
मध्य रणक्षेत्र में असिधार पर सोती जवानी है ।।'
        लखनऊ से आये ग़ज़लकार मिज़ाज़ लखनवी ने रूहानी शायराना कलाम पेश किया तो श्रोता उसी में डूबते चले गए -
'पागल था मैं भी चल पड़ा बाजार की तरफ,
पिछली सदी के हाथ में सिक्के लिए हुए ।'
       बाराबंकी से पधारे संदीप अनुरागी ने नोट बंदी पर समसामयिक रचना सुनाकर खूब तालियाँ बटोरीं -
'एकदम से लगा बैन ई पैसा के लिए है,
दादा बड़े बेचैन ई पैसा के लिए हैं ।
सत्तर बरस के बुढ़ऊ कहूँ जाति न रहैं,
उनहू लगाय लाइन ई पैसा के लिए हैं ।।'
         लखनऊ के चेतराम अज्ञानी ने व्यंग्य प्रधान अवधी रचनाएँ सुनाकर लोगों का दिल जीत लिया -
'पाकिस्ताँ मक्कार है, करति हवै अनरीत ।
सत्य क अपने देश मा, भवै हमेशा जीत ।।'
          लखनऊ से आयी कवयित्री प्रज्ञा शुक्ला ने शृंगार और अंगार दोनों को अपना विषय बनाते हुए मुक्तक और गीत सुनाकर सब का मन मोह लिया।
अध्यक्षीय काव्यपाठ करते हुए कविता लोक सृजन संस्थान के संरक्षक ओम नीरव ने अपने छंदों में व्यक्ति और समाज के यथार्थ का चित्रण कर सभी को आनन्द विभोर कर दिया और फिर राष्ट्र नायक को ये पंक्तियाँ समर्पित कीं -
'माली हो सुनो रहा करो सदा-सदा सचेत,
उग आते बाग़ में कभी-कभी बबूल भी ।
प्रेम के पथिक छाले पाँव में निहारो नहीं,
नेह से लगाओ अंक फूल और शूल भी ।।'
कार्यक्रम का समापन संयोजक सुनील त्रिपाठी के धन्यवाद-ज्ञापन से हुआ।
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