रविवार, 27 नवंबर 2016

कवितालोक - जयपुर की द्वितीय मासिक काव्यशाला संपन्न


कवितालोक
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       जयपुर की द्वितीय-काव्यशाला का आयोजन संस्था के संस्थापक ओम नीरव जी के संरक्षण और वरिष्ठ सदस्य और चतुष्पदी समारोह के संचालक श्री लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला जी के संयोजन में गंगोत्री नगर,गोपालपुरा,जयपुर स्थित उनके निवास पर श्री आर.सी.शर्मा गोपाल जी की अध्यक्षता  में संपन्न हुआ |
   गोष्ठी में डॉ. बजरंग सोनी ने प्राकृति के प्रतीकों का प्रयोग कर सुंदर भाव बिम्ब उकेरे - “प्यार हो ही जाता है पहाड़ को फिजाओं से, पेड़ को हवाओं से' और फिर अजन्मी कन्याओं को शब्दायित करती मार्मिक रचना सुनाई जिससे कई आँखें नाम हो गईं।
     आर.सी. शर्मा गोपाल जी ने देश की समकालीन परिस्थितियों पर रचनाएँ सुनाकर श्रीताओं को मंत्रमुग्ध कर लिया, उनका प्रशंसित दोहा-
बहुत कहा संतोष रख, छोड़ों संचय भाव,
डूबीं अपने बोझ से,जिनकी भारी नाव।
       सुशील सरना जी ने राष्ट्रीय एकता हा संदेश कुछ इसप्रकार व्यंजित किया-
जमी से ज़रा राख उठाकर बताओ,
ये हिन्दू है या मुसलमान बताओ।
    सुरेश गोस्वामी 'सुरेशजी' जी ने भाव भरे दोहे सुनाकर खूब तालियाँ प्राप्त कीं -
सभी देव, तीरथ धरम, पुण्य, तपस्या दान,
मिल जाएं होता जहाँ नारी का सम्मान” |
मौन साधना है पिता, सतत करे संघर्ष,
अनुशासन पुरुषार्थ से, परिजन को दे हर्ष |
      कवयित्री शिवानी शर्मा जी ने हृदय की भाषा में रचना सुनाई तो श्रोता वाह-वाह कर उठे-
मेरी दीवानगी उनको हद से ज्यादा खलती है,
नफरतें ही नफरतें जिनके दिल में पल में पलती है।
     चन्द्र प्रकाश पारीक जी ने समाज को दर्पण दिखाते हुए सुनाया -
जीने का सामान बहुत है,
इंसान भी शैतान बहुत है।
     संयोजक लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला ने चांदों की छट बिखेरते हुए इन पंक्तियों पर श्रोताओं की सराहना प्राप्त की -
परेशान जनता को करते, षड्यंत्रों का बुनते जाल,
काले धन से भरा खजाना, आज बना जी का जंजाल।
और फिर गीतिका सुनाई तो श्रोता युग्म प्रति युग्म पर वाह-वाह करने के लिए विवश हो गए-
चौराहे पर खड़ी जिन्दगी, मुश्किल है समझाना,
निर्जन वन को दीन निहारें, खाली हुआ खजाना |
हो जाती जब शाम जिन्दगी, दूर तभी तब अपने,
कठिन डगर सी लगें जिन्दगी, मुश्किल वक्त बिताना।
रतन राठौड़ जी ने भावभरी रचना सुनाकर श्रोताओं का हृदय जीत लिया-
बन्द आँखों से रिझाना आ गया, लो हमें अब मुस्कुराना आ गया।
इनके अतिरिक्त आलोक चतुर्वेदी जी सहित सभी कवियों के सरस काव्य पाठ के साथ काव्यशाला में कोई चार घंटे तक गीत गीतिका, छंद, मुक्तक आदि का रसास्वादन होता रहा।       
            इसी बीच कवितालोक के संस्थापक श्रद्धेय ओम नीरव जी ने लखनऊ से लड़ीवाला जी के मोबाइल पर सभी आगंतुक कवियों को अपना शुभ कामना सन्देश दिया और खेद व्यक्त करते हुए बताया कि उनकी भाभी का निधन को जाने के कारण वे नहीं पहुँच सके। सभी ने उनकी भाभी के आकस्मिक निधन पर दुख जताते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। इस अवसर पर आर.सी. शर्मा गोपाल जी, अलोक चतुर्वेदी जी और रतन राठोड जी को लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला के प्रथम काव्य संग्रह "करते शब्द प्रहार" की प्रतियाँ भेंट की गईं। अंत में संयोजक लड़ीवाला जी ने गोष्ठी को सफल बनाने के लिए उपस्थित सभी साहित्यकारों का आभार व्यक्त किया और कवितालोक कार्यशाला के भावी आयोजनों को अधिकाधिक उपस्थिति से सफल बनाने का आह्वान किया।

प्रस्तुति :---
लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला

शनिवार, 26 नवंबर 2016

पीरनगर (सीतापुर) में कवितालोक विराट कविसम्मेलन


     'कवितालोक सृजन संस्थान' के तत्वावधान में एक 'विराट कवि सम्मेलन' का आयोजन 24 नवम्बर 2016 गुरुवार को पीरनगर, सीतापुर में 'श्री साठिका देवी मंदिर यज्ञ संचालक समिति' के सौजन्य से ओम नीरव के संरक्षण एवं सुनील त्रिपाठी के संयोजन में किया गया। आयोजन की अध्यक्षता ओम नीरव ने की और संचालन जाने माने मंच संचालक आशुकवि कमलेश मौर्य मृदु ने किया। मुख्य अतिथि के रूप में बम्हेरा निवासी सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य रमेशचन्द्र पान्डेय और विशिष्ट अतिथि के रूप में शुभांजलि प्रकाशन कानपुर के प्रबन्धक  डाॅ. सुभाष चन्द्रा उपस्थित रहे। कार्यक्रम का प्रारम्भ सिधौली सीतापुर के युवाकवि और मंचों के प्रसिद्द कवि लवकुश दीक्षित के प्रपौत्र वंश दीक्षित की सुमधुर वाणी वंदना से हुआ। इस अवसर पर पधारे हुए कवियों को हिन्दी साहित्य के संवर्धन में अप्रतिम योगदान के लिए शाल उढ़ाकर और सम्मान पत्र देकर कवितालोक द्वारा 'काव्य रत्न' सारस्वत सम्मान से विभूषित किया गया तथा ओम नीरव को श्री साठिका देवी यग्य संचालक समिति द्वारा काव्य विभूषण सम्मान से अलंकृत किया गया ।
          इस अवसर पर कवियों ने छंद, मुक्तक, गीत, गीतिका, ग़ज़ल, व्यंग्य आदि के द्वारा श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर लिया । रात्रि की तीसरे पहर तक अनवरत चलने वाले इस कार्यक्रम में काव्यपाठ करते हुए:------
       मनकापुर, गोंडा से पधारे गीतों के युवराज धीरज श्रीवास्तव ने भावभरी उत्कृष्ट रचनाएँ सुनाकर श्रोताओं का मन मुग्ध कर लिया। उनकी पंक्तियाँ -
' साँझ जब आँसू बहाये, बैठ दिल के द्वार पर ।
क्या भरोसा भोर का फिर, क्या तुम्हारे प्यार पर ।।'
        पीलीभीत से पधारे गीतकार संजीव मिश्र ने भारत की बेटियों पर रचना सुनाकर श्रोताकर को भावविभोर कर दिया -
धूप हो या छाँव हो पर मुस्कराती बेटियाँ,
आंधीयों में भी चरागों को जलाती बेटियाँ।
         सिधौली से पधारे वंश दीक्षित ने राष्ट्रीय गीत सुनाकर श्रोताओं में राष्ट्रीय भावना का संचार किया-
तिरंगे तेरा रूप महान।
तीन रंग में रंगा हुआ है पूरा हिंदुस्तान।
           नोटों की तत्कालीन समस्या पर लखीमपुर से आए अवधी कवि ज्ञान प्रकाश आकुल  की रचना का श्रीताओं ने जोरदार तालियों से स्वागत किया-
का सारा धन बाहर आई बड़कई तिजोरी ग्वाटन का,
सब भड़भड़ु मचिएगा न्वाटन का। 
      बाराबंकी से आये डॉ. सर्मेश शर्मा ने अपनी रचनाओं से भरपूर तालियाँ बटोरीं-
'सदा सौहार्द की सम्वेदनाएँ लेके चलते हैं ,
प्रफुल्लित हों सभी ऐसी फिजायें लेके चलते हैं ।' 
        लखनऊ से पधारे आशुकवि कमलेश मौर्य 'मृदु' ने हिंदी छंदों का मान बढ़ाती इन पंक्तियों को पढ़कर सभी को अपना प्रशंसक बना लिया-
'सत्तर वर्ष नागपंचमी मनाते बीते,
अब नागयज्ञ पर विमर्श होना चाहिए ।
पाक बांग्ला ढाका इस्लामाबाद तक
अखण्ड भारत वर्ष होना चाहिए ।।'
      सुलतानपुर से पधारे अवनीश त्रिपाठी की गीतिका पर श्रोता झूम उठे, उनकी गीतिका का युग्म -
'धुंध की चादर लपेटे धूप अलसाई हुई,
बात लेकिन हो रही है ताप के विस्तार की ।'
       लखनऊ से आये उमाकान्त पांडेय ने राष्ट्रीय भावना की रचना पढ़कर श्रोताओं की प्रशंसा प्राप्त की -
'रक्त की प्रत्येक बूँद तुमको चढ़ायें तो भी,
रहेंगे तुम्हारे कर्जदार वन्देमातरम ।
अन्न जल जिसने छुआ है माँ भारती का,
उसे कहना पड़ेगा बार-बार वन्देमातरम ।।'
     संयोजक सुनील त्रिपाठी की ओजपूर्ण प्रस्तुति सुनकर श्रोता रोमांचित हो उठे-
'याचना अब नहीं सिर्फ रण चाहिये ,
घात-प्रतिघात प्रत्याक्रमण चाहिये ।'
         लखनऊ के राहुल द्विवेदी 'स्मित' की इन पंक्तियों पर भरपूर तालियाँ मिलीं-
'तिनका तिनका बिखर रहा है यह प्यारा संसार ।
जाने किसने बना दिया है रिश्तों की ब्यापार ।।'
          पीलीभीत से पधारे संजीव मिश्र के गीत की पंक्तियाँ सभी की आँखों को पसीज गयीं -
'गुमसुम बच्चों के सँग बैठी लेकर पूजा की थाली ।
दीप जलाऊँ फिर भी तुम बिन लगती सूनी दीवाली ।।'
      लखनऊ के हरीश लोहुमी ने प्रभावशाली शब्दों में सुनाया -
'बात टाली गयी दिवाली में, रात खाली गयी दिवाली में ।
कुछ वजह थी तभी तो थोड़ी सी, फिर मँगा ली गयी दिवाली में ।'
       लखनऊ से पधारे ग़ज़लकार मंजुल मंजर लखनवी ने सम्पूर्ण जन मानस का आह्वान करते हुए कहा -
'हमारी आने वाली पीढ़ियों को गर बचाना है ,
तो आओ रोक लें मिलकर ये जहरीली हवाएँ हम ।'
          सीतापुर से आये केदार नाथ शुक्ला ने देश के जवानों का गौरव गान करती हुई रचनाएँ सुनाकर श्रोताओं का हृदय जीत लिया, उनकी पंक्तियाँ -
'सेज सुमनों की सजाकर खार पर सोती जवानी है ।
मध्य रणक्षेत्र में असिधार पर सोती जवानी है ।।'
        लखनऊ से आये ग़ज़लकार मिज़ाज़ लखनवी ने रूहानी शायराना कलाम पेश किया तो श्रोता उसी में डूबते चले गए -
'पागल था मैं भी चल पड़ा बाजार की तरफ,
पिछली सदी के हाथ में सिक्के लिए हुए ।'
       बाराबंकी से पधारे संदीप अनुरागी ने नोट बंदी पर समसामयिक रचना सुनाकर खूब तालियाँ बटोरीं -
'एकदम से लगा बैन ई पैसा के लिए है,
दादा बड़े बेचैन ई पैसा के लिए हैं ।
सत्तर बरस के बुढ़ऊ कहूँ जाति न रहैं,
उनहू लगाय लाइन ई पैसा के लिए हैं ।।'
         लखनऊ के चेतराम अज्ञानी ने व्यंग्य प्रधान अवधी रचनाएँ सुनाकर लोगों का दिल जीत लिया -
'पाकिस्ताँ मक्कार है, करति हवै अनरीत ।
सत्य क अपने देश मा, भवै हमेशा जीत ।।'
          लखनऊ से आयी कवयित्री प्रज्ञा शुक्ला ने शृंगार और अंगार दोनों को अपना विषय बनाते हुए मुक्तक और गीत सुनाकर सब का मन मोह लिया।
अध्यक्षीय काव्यपाठ करते हुए कविता लोक सृजन संस्थान के संरक्षक ओम नीरव ने अपने छंदों में व्यक्ति और समाज के यथार्थ का चित्रण कर सभी को आनन्द विभोर कर दिया और फिर राष्ट्र नायक को ये पंक्तियाँ समर्पित कीं -
'माली हो सुनो रहा करो सदा-सदा सचेत,
उग आते बाग़ में कभी-कभी बबूल भी ।
प्रेम के पथिक छाले पाँव में निहारो नहीं,
नेह से लगाओ अंक फूल और शूल भी ।।'
कार्यक्रम का समापन संयोजक सुनील त्रिपाठी के धन्यवाद-ज्ञापन से हुआ।
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मंगलवार, 22 नवंबर 2016

मानव मन की सहज अनुभूतियों के गीतों का संकलन - 'मेरे गाँव की चिनमुनकी'

समीक्ष्य कृति – गीत संग्रह ‘मेरे गाँव की चिनमुनकी’ 
कृतिकार – धीरज श्रीवास्तव, चलभाष - 8858001681 
समीक्षक – ओम नीरव, चलभाष- 7526063802, ईमेल neeravom1948@gmail.com
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       छंदमुक्त कविता ने जहाँ एक ओर लेखनी को अभिव्यक्ति के अधिक अवसर प्रदान किये हैं वहीं दूसरी ओर जाने-अनजाने छंदबद्ध कविता को क्षति पहुँचाने का कार्य भी किया है। अनेक रचनाकार छंदबद्धता को अभिव्यक्ति में बाधक बताकर न केवल अपनी शिल्पगत दुर्बलताओं को छिपा रहे हैं अपितु अपनी दुर्बलताओं को नवीन विधा के रूप में महिमामंडित करते भी देखे गये हैं। छंदमुक्त कविता के अस्तित्व को छांदस कविता की उपेक्षा या भर्त्सना के रूप में प्रस्तुत करने का चलन-सा हो गया है। यह छांदस काव्य विधाओं के लिए संकटकालीन स्थिति है। ऐसी त्रासद स्थिति में यदि कोई छंदबद्ध, भावप्रवण और सरस गीतों का संकलन प्रकाश में आता है तो लगता है जैसे जेठ की तपती दुपहरी में कोई पवन का शीतल झोंका तन-मन को रस-सिक्त कर गया हो। कुछ ऐसी ही अनुभूति हो रही है गीतों के लड़ैते राजकुमार धीरज श्रीवास्तव का गीत संग्रह ‘मेरे गाँव की चिनमुनकी’ को पढ़कर। 
      धीरज जी एक लंबे अंतराल से छांदानुशासित गीतों के सृजन में संलग्न रहे हैं। उनके गीतों में कोमल भावनाओं का असीम सागर लहराता हुआ दिखाई देता है और इस सागर की उद्दाम तरंगों को शिल्पबद्ध करने की विशिष्ट क्षमता उनकी लेखनी में विद्यमान है। इसप्रकार भाव और शिल्प दोनों का मनोहारी समागम उनके गीतों को उत्कर्ष प्रदान करता है। अधिकांश गीतों में गाँव की माटी को भारतीय संस्कृति के सलिल में सान कर लोक भाषा की हथेली से आकार दिया गया है और फिर छांदस शिल्प के  आवे में तपाकर लोकार्पित किया गया है। एक झलक दृष्टव्य- 
क्या अब भी रस्ते कच्चे हैं/ जिनपर हम आते जाते थे? 
क्या पेड़ अभी है जामुन का/ हम बैठ जहाँ सुस्ताते थे?  
क्या झूला अब भी पड़ता है/ उस हरीराम की बगिया में? 
क्या सभी सितारे टँके हुए/ हैं अभी तलक उस अँगिया में? 
      गीत के मुख्य अंग होते हैं – मुखड़ा, टेक, अंतरे, पूरक पंक्तियाँ, गेयता, तुकांत विधान, भावप्रवणता। यदि ‘मेरे गाँव की चिनमुनकी’ के गीतों की बुनावट को देखा जाये तो गीत का अंग-प्रत्यंग पुष्ट दिखाई देता है। धीरज जी मुखड़े के चुनाव में विशेष सजग दिखाई देते हैं। उनके प्रत्येक गीत का मुखड़ा कथ्य की सटीक प्रस्तावना करने के साथ अंतरों को पढ़ने के लिए प्रबल जिज्ञासा उत्पन्न करता है। मुखड़े की उस पंक्ति को टेक के रूप में लिया गया है जो अंतरे की पूरक पंक्ति साथ सटीकता से भाव साम्य स्थापित करती हो। गीतों के अंतरे इस कौशल के साथ बुने गए हैं कि प्रारम्भिक पंक्तियों में कथ्य का संधान और पूरक पंक्ति में प्रहार के साथ विलक्षण भावप्रवणता उत्पन्न की गयी है। इस दृष्टि से एक गीत का मुखड़ा और एक अंतरा दृष्टव्य है,  
लड़ा उम्र भर जेठ निरंतर/ पूस करे जी भर मनमानी। 
उस पर बैठा मीट हृदय में/ उलच रहा आँखों का पानी। (मुखड़ा) 
अंगारों पर रात काटकर/ जैसे तैसे खड़े हुए हैं। 
शूलों पर ही चलते-चलते/ हम दुनियाँ में बड़े हुए हैं। 
(अंतरे की प्रारम्भिक पंक्तियाँ) 
रोटी तक को बचपन तरसा/ खूब हुई हैरान जवानी। 
(अंतरे की पूरक पंक्ति) 
उस पर बैठा मीत हृदय में/ उलच रहा आँखों का पानी। (टेक) 
      गीत की गेयता का नियामक होता है – कोई न कोई छंद, जिसे हम गीत का आधार छंद कह सकते हैं। इस कृति के गीतों में जिन छंदों का प्रयोग किया गया है वे उदाहरण सहित इसप्रकार हैं - (1) चौपाई छंद (16 मात्रा, अंत में गाल वर्जित) मन का है विश्वास तुम्हीं से। (2) पदपादाकुलक (16 मात्रा, आदि में गुरु अनिवार्य, उस गुरु के बाद यदि एक त्रिकल हो तो उसके बाद दूसरा त्रिकल अनिवार्य) लिख रहा पत्र मैं आज तुम्हें (3) लावणी (30 मात्रा, 16,14 पर यति, अंत में वाचिक गुरु) अम्मा तुन तो चली गयीं पर, लाल तुम्हारा झेल रहा। (4) विष्णुपद (26 मात्रा, 16,10 पर यति, अंत में गुरु) हुई जेठ की धूप ज़िंदगी, जलता रहता हूँ। (5) सरसी (27 मात्रा, 16,11 पर यति, अंत में गाल) भाग रही है बचती-बचती, घिरी हुई है आग। (6) गीतिका (मापनी – 2122 2122 2122 212) कौन आकर रंग लब का,रात भर मुँह पर मले। (7) आनंदवर्धक (मापनी- 2122 2122 212) ये उदासी प्राण लेकर जा रही। (8) मधुमालती (मापनी- 2122 2122) हो सके तो माफ करना। 
      गीतों में छंदों को सटीकता से साधने के कारण गेयता कहीं भी बाधित नहीं हुई है। कुछ गीतों में एक से अधिक छंदों का सुरुचिपूर्ण सम्मिश्रण है जिसमें लय की निरंतरता का विशेष ध्यान रखा गया है जैसे चौपाई के साथ लावणी, चौपाई के साथ विष्णुपद, विष्णुपद के साथ लावणी, सरसी के साथ लावणी, आनंदवर्धक के साथ गीतिका और मधुमालती के साथ गीतिका। उदाहरणार्थ इस गीत के अंतर्गत सरसी छंद में निबद्ध मुखड़ा और लावणी छंद में निबद्ध अंतरा मिलकर लयात्मक निरंतरता के साथ सम्मोहक गेयता उत्पन्न करते हैं- 
पुरवाई के संग आ रही/ भीनी-भीनी गंध। 
महक उठा है तुम्हें यादकर/ फिर से वो संबंध।  
जाने कितने दाँव लगाये/ बहुत लड़े पर हार गये। 
मंडित मस्जिद गुरुद्वारों में/ जाने कितनी बार गये। 
कर पाये पर नहीं वक्त से/ हम कोई अनुबंध। 
      गीतों की भाषा व्यावहारिक खड़ी बोली हिन्दी के साथ-साथ वस्तुतः कवि के हृदय की भाषा है जो पाठक-मन की गहराई तक सीधे उतरती चली जाती है। माधुर्य एवं प्रसाद गुणों से युक्त गीतों के इस संग्रह में मुख्यतः विप्रलंभ शृंगार है जो आकाशीय न होकर जीवन के यथार्थ धरातल पर पल्लवित होता है जहाँ पर दया, करुणा, क्षमा, ममता जैसे सकारात्मक भावों की तरलता के साथ छल, प्रपंच, गरीबी, शोषण, व्यभिचार, पाशविक क्रूरता जैसे नकारात्मक भावों की विद्रूपता भी कम नहीं है तथा कुछ गीत करुण रस प्रधान हैं जिनमें युगीन विसंगतियों से पीड़ित मानवता का बिम्ब बड़ी यथार्थता के साथ उकेरा गया है। इसकी एक झलक-  
यहाँ पहुँच से बिलकुल बाहर/ आलू का है दाम हुआ। 
सूखे लहसुन अरमानों के/ और प्याज बदनाम हुआ। 
आसमान में रोज खोंटती/ बस बथुए का साग सखी। 
दाल खौलती है चूल्हे मैं/ जले पतीली आग सखी। 
      धीरज जी के गीतों में नये-नये प्रतीकों का प्रयोग कर अतीव मनोहारी बिम्ब योजनाएँ प्रस्तुत की गयी है जिनका उद्देश्य नवीनता के आग्रह को पूरा करना मात्र न होकर संप्रेषणीयता में अभिवृद्धि करना ही है।  बिम्ब-विधान का एक उदाहरण - 
लड़ा उम्र भर जेठ निरंतर/ पूस करे जी भर मनमानी। 
उस पर बैठा मीत हृदय में/ उलच रहा आंखों का पानी। 
      कृति के गीतों में गीतकार के संवेदनशील हृदय का बिम्ब सहज ही देखा जा सकता है- 
मुखिया जी सब जान रहे थे/ किसने अस्मत लूटी थी। 
आउट बिचारी क्योंकर आखिर/ अंदर से वह टूटी थी। 
देशी दारू थी पहले ही/ मछली तली गयी। 
देख गाँव का भ्रष्ट आचरण/ कमली चली गयी। 
      कवि ने गीत की मिठास में सना जन-जागरण का संदेश भी बड़ी कुशाग्रता से संप्रेषित किया है- 
दारू पीकर चौकीदारी/ जाने कितने साल किया। 
फूट गयी पर पोल एक दिन/ कर्मों ने कंगाल किया। 
हाथ नहीं रह गयी नौकरी/ बैठा सिर खुजलाए अब। 
फूटी कौड़ी नहीं जेब में/ किस से ठग कर लाये अब। 
      इस कृति में गीतों के संग्रह से पूर्व प्रस्तुत अवनीश त्रिपाठी का आलेख समीक्षा साहित्य की एक अनमोल धरोहर है। उनके इस कथ्य से मैं पूर्णतः सहमत हूँ कि ‘धीरज जी मानव मन की कोमलता के पारंगत पारखी है’। 
      समग्रतः धीरज श्रीवास्तव जी के गीतों का यह संग्रह ‘ मेरे गाँव की चिनमुनकी’ पुनः पुनः पठनीय और संग्रहणीय है। मेरा विश्वास हैं यह कृति हिन्दी काव्य साहित्य में यथेष्ट सम्मान प्राप्त करेगी और नव गीतकारों के सटीक सृजन की प्रेरणा स्रोत बनेगी। 
ओम नीरव 
संस्थापक अध्यक्ष ‘कवितालोक’, लखनऊ 
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