रविवार, 28 अगस्त 2016

कवितालोक सृजन संस्थान लखनऊ द्वारा महोना काव्यशाला का सफल आयोजन

कवितालोक काव्यशाला
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कवितालोक सृजन संस्थान के सौजन्य से एक काव्यशाला का भव्य आयोजन चंद्रवाटिका शिक्षा निकेतन महोना के सभागार में प्रख्यात गीतकार डॉ अजय प्रसून की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ जिसका उदघाटन आयोजन प्रमुख डॉ चन्द्र कुमार मिश्र ने अपने स्वागत भाषण से किया। आयोजन के मुख्य अतिथि सिवान बिहार से पधारे ओज कवि परमहंस मिश्र 'प्रचंड', विशिष्ट अतिथि सिधौली सीतापुर से पधारे ओज कवि केदार नाथ शुक्ल और वयोवृद्ध कवि नारायण दीन की उपस्थिति और युवा कवि राहुल द्विवेदी के संचालन में आमंत्रित कवियों और कवयित्रियों के प्रभावशाली काव्य पाठ के साथ समीक्षा और प्रश्नोत्तर का कार्यक्रम बहुत रोचक रहा और लगातार पाँच घंटे तक चलता रहा। युवाकवि विपिन मलिहाबादी द्वारा प्रस्तुत की गयी गीतिका की विस्तृत समीक्षा कवितालोक के संस्थापक अध्यक्ष ओम नीरव ने की जिसे रचनाकारों ने विशेष रुचि से सुना।
प्रश्नोत्तर कार्यक्रम में शिक्षा निकेतन के कक्षा 10 के छात्र सूरज कुमार ने पूछा कि छंद में यति का क्या महत्व है, कक्षा 9 की छात्रा बुशरा फातिमा ने पूछा कि कविता में कितनी पंक्तियाँ होनी चाहिए और कक्षा 10 के छात्र अर्पित शर्मा ने पूछा कि कविता के गहरे अर्थ को कैसा समझा जा सकता है? सभी प्रश्नों के उत्तर मंच से बहुत सीधी सरल भाषा में उदाहरण के साथ दिये गए जिसका विद्यार्थियों ने हृदय से स्वागत किया। प्रश्नों का समाधान देने में ओम नीरव, परमहंस ‘प्रचंड’ और केदार नाथ शुक्ल की विशेष भूमिका रही। इस अवसर पर विशिष्ट साहित्य-सेवा के लिए डॉ चन्द्र कुमार मिश्र, परमहंस मिश्र ‘प्रचंड’ और केदार नाथ शुक्ल को ‘कवितालोक रत्न’ सारस्वत सम्मान प्रदान किया गया। तीनों विभूतियों को अध्यक्ष डॉ अजय प्रसून ने उत्तरीय उढ़ाकर और ओम नीरव ने सम्मान पत्र भेंट कर सम्मानित किया।
काव्य पाठ का प्रारम्भ छंदकार मुकेश मिश्र की वाणी वंदना से हुआ जिसे ऊंचाई प्रदान करते हुए कवयित्री नीलम भारती ने इन पंक्तियों पर खूब वाहवाही लूटी -
होंठों पर उनका ही तराना होता है,
जिनका दिल में खास ठिकाना होता है।
केदार नाथ शुक्ल ने ओज भरी वाणी से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर लिया -
होकर दुख से द्रवित शिला जब गलने लगती है,
तभी हमारी रुकी लेखनी चलने लगती है।
परमहंस मिश्र प्रचंड की इन पंक्तियों का श्रोताओं ने जोरदार तालियों से स्वागत किया -
दुश्मनी धोइए मीत बन जाइए,
आप खुद हारकर जीत बन जाइए।
हिन्दी प्रधान गीतिका पढ़ते हुये विपिन मलिहाबादी ने कहा -
गीतिका भी बनी अब ग़ज़ल की बहन
अब धरा मिल गयी, मिल गया है गगन।
संपत्ति कुमार भ्रमर बैसवारी ने छंदों की छटा बिखेरते हुए श्रोताओं का दिल जीत लिया, कुछ इस प्रकार -
जिसकी त्रिलोक मैं है छाई महिमा अपार,
ज्ञानी महाज्ञानी कोई पार नहीं पाता है,
वही नंदलाल हो बेहाल ग्वाल बाल सँग,
रूठी बृषभानुजा को दीन हो मनाता है।
मंजुल मंज़र लखनवी के मुक्तक की इन पंक्तियों पर श्रोता झूम उठे -
ताब अच्छी नहीं मुहब्बत में,
सारे रिश्ते जला के रख देगी।
शिखर अवस्थी की इन पंक्तियों पर बहुत वाहवाही मिली -
लेकर कलम हाथ में अपनी भारत माँ का गान लिखो,
जब भी लिखना पड़े देश तो अपना हिंदुस्तान लिखो
मिजाज लखनवी की तरन्नुम से पढ़ी इन पंक्तियों पर खूब तालियाँ मिली -
ईश में नाकामियाँ बढ़ती गईं
और मैं घटता गया तेरे लिए।
मनोज शुक्ल ‘मनुज’ कि धारदार कहन का लोगों पर जानदार असर दिखाई दिया -
सभ्यता का जो रुपट्टा था कभी,
आज वेश्या का बिछौना हो गया।
अध्यक्ष डॉ अजय प्रसून के साहित्यिक और प्रभावशाली काव्य पाठ ने मंच को शिखर पर पहुंचा दिया -
ज़िन्दगी का सच कभी हारा नहीं,
क्योंकि सच है रेत की धारा नहीं।
इनके अतिरिक्त अपने काव्य पाठ से श्रोताओं को रससिक्त करने वाले अन्य कवियों में प्रमुख थे – नारायण दीन, शराफत बिसवानी, शिखर अवस्थी, गौरव पाण्डेय ‘रुद्र’, राम राय राणा, भैरव नाथ पाण्डेय, मुकेश कुमार मिश्र, राहुल द्विवेदी स्मित और ओम नीरव।